101…

कमरे में किसी चीज़ में हवा भरने और निकलने की कृत्रिम ध्वनी आ रही थी, कमरे में उस कृत्रिम ध्वनि के अलावे कोई और आवाज़ नहीं थी। अचानक चारों तरफ साईरन आवाज़ गूंजने लगी। पूरे कमरे में लाल बत्ती की रौशनी फ़ैल गयी। कमरे के बीचों- बीच एक लम्बा सा बड़ा धातु का चेम्बर नुमा डब्बा था। उसके ऊपर एक स्क्रीन लगी थी जिसपर अंग्रेज़ी में लिखा आ रहा था,”हाइबरनेशन कम्पलीट, सबजेक्ट हार्ट बीट…35…47,…..63….74….74….74, ब्लड प्रेशर स्टेबल , ब्रिदिंग रेट नार्मल, इवाकुऐशन स्टार्टस इन 20…19….,18….”। इस बीच पुरे कमरे में एक धुंए जैसी गैस खुद-ब-खुद भर गई। दिवार पर लगी एक और स्क्रीन पर लिखा आ रहा था,”ऑक्सिजनेशन सकसेसफूल”।इवाकुएशन पूरा होने में 5 सेकण्ड बचे थे। 5..4….3…..2……1, उस चेम्बर से काफी दाब के साथ गैस के निकलने की आवाज़ आयी। चेम्बर का ढक्कन किताब के पन्ने की तरह खुल गया। उसमे एक आदमी सोया हुआ था,जिसके मुँह पर एक किस्म की कृत्रिम श्वास नली और नाक के साथ मुंह को ढके हुए एक मास्क था। उस आदमी उसका सीना हवा भरने से फूल और पचक रहा था।  र्स्क्रीन और लिखा आया,” फ्लशिंग ऑफ़ लंग्स कम्पलीट इन 5…4…3…2…1।  वह आदमी एक झटके के साथ उठ कर बैठ गया और आँखे फाड़ कर ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगा मानो की किसी ने उसके फेफड़ों में पानी भर दिया हो। खासते -खासते थोड़ी देर बाद उसे आराम हुआ और वह लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगा। खांस-खांस कर वह थक गया था। उसने अपना मास्क उतारा। मास्क को हटाया तो उस मास्क से जुडी हुई श्वास नली थी जो की उसके फेफड़ों तक गयी हुई थी,धीरे-धीरे उसने उस श्वास नली को भी निकाला जिसके कारण वह थोड़ा और खाँसा।उसने उस मास्क और श्वास नली को दूर फेक दिया।वह अपने सीने को धीरे से सहला रहा था। उसकी नज़र दिवार पर लगी स्क्रीन पर गयी।वह उठ कर स्क्रीन के पास गया जिसपर लिखा आ रहा था,”पुट योर पाम ऑन द स्क्रीन”। उसने ऐसा ही किया उसके ऐसा करते ही लाल बत्ती और साईरन बंद हो गये,कमरे में सफ़ेद रौशनी आ गयी,दिवार से एक कुर्सी निकल कर आई, और उन दिवार पर लगी स्क्रीन से एक होलोग्राफिक प्रोजेक्शन वाली कृत्रिम महिला निकली जिसने उस आदमी को उस कुर्सी पर बैठने को कहा। वह आदमी उस कुर्सी पर बैठ गया। उस होलोग्राफिक महिला ने कहा,”मैं एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता हूँ (artificial intelligence) मेरा नाम हिन्दू देवी सरस्वती पर रखा गया है क्योंकि मैं अभी तक के मानव द्वारा अर्जित किये गए सारे ज्ञान और विज्ञान को जानती हूँ ,मेरे डेटाबेस में इंसान द्वारा लिखी गयी आजतक के सारी किताबों की लाइब्रेरी है।मुझे तुमहारे लिए ही मेरे रचयिता ने बनाया था ताकि मैं तुम्हारे मिशन को पूरा करने में तुम्हारी मदद कर सकूँ।तुम्हारा नाम 101 है,तुम एक सैनिक हो। तम्हारे जैसे कई सैनिक थे जो अब मर चुके हैं। तुम अपने मूल रूप के 101 नंबर के मानव क्लोन हो,लेकिन तुम बाकी के 100 क्लोनों से अलग हो इसलिए तुम्हे हाइबरनेशन में रखा गया था,ताकि जब दुनिया की 99. 9999% आबादी ख़त्म हो जाए तो जो बचे हुए लोगों को दूसरे गृह पर ले जाने में तुम हमारी मदद करो। तुम्हारे जैसे 500 क्लोन और भी हैं।तुम्हें उन्हें ढूँढना है और इसके साथ ही मानव सभ्यता को आगे ले जाने में हमे तुम्हारी ज़रुरत पड़ेगी उसके लिए तुम्हे दूरसे खोजे गये ग्रहों पर जा कर रहना होगा क्योंकि पृथ्वी मर चुकी है,यहाँ कुल मिला कर 50000 से भी कम मनुष्य बच पाएं हैं जिन्हें हाइबरनेशन में रखा गया है ताकि वे बूढ़े न हो सकें। यहाँ से निकलने के बाद शायद तुम्हें दुश्मन फौजियों का सामना करना पड़े इसलिए तुम्हें तैयार रहना है।बाहर हवा ज़हरीली है,और 700 साल से एसिड की बारिश हो रही है। इस ग्रह के वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड में यहां से 980 प्रकाश वर्ष दूर कृत्रिम स्टेशन में एक ग्रह की परिक्रमा कर रहे हैं।पिछले 30 सालों से वे भी हाइबरनेशन में सोए हुए हैं। ये रहे तुमारे हथियार और ये लाइफ-सूट”। ज़मीन से एक टेबल नुमा चीज़ निकली जिसपर हथियार और लाइफ-सूट रहजे हुए थे। 101 ने सूट पहना और अपना हथियार उठा लिया। लाइफ- सूट की बांह पर एक स्क्रीन था जिस पर 101 की स्थिति से 200 मीटर के गोलार्ध के दायरे का विवरण दिख रहा था। 101 ने एक हेलमेट भी पहन रखा था जिसके चलते वह होलोग्राम उसके हेलमेट के शीशे के अंदरूनी सतह पर दिख रही थी और उसे दिशा निर्देश कर रही थी। 101 अब बाहर था,बाहर बिलकुल अलग ही दुनिया थी। बादल गरज रहे थे, दूर-दूर तक सिर्फ मलबा पड़ा हुआ था।ज़मीन फटी हुई थी मानो किसी ने धरती को बीचों-बीच फाड़ डाला हो।अम्लीय वर्ष से निर्मित लंबे-लंबे और विक्राल नाले। लाखों -लाख जली भुनी गाड़ियों,स्कूटर,ट्रक,बस और अन्य वाहनों के कंकाल,जिन्हें देख ऐसा लग रहा था मानो किसी जाम में फसे हों और अचानक ही ऊष्मा के ताप से भून गये हों। ज़ोर से चलती हुई हवा और अपने साथ लिए हुए अम्लीय वर्ष की बूंदे जो की वाहनों पर टन-टन की आवाज़ सैकड़ो सालों से कर रही थी। कुछ वाहन अम्लीय वर्षा से गल भी गये थे और कुछ बचे हुए थे। दूर से एक कीं-कीं की आवाज़ आ रही थी। 101 ने उस आवाज़ पर अपने हेलमेट के स्क्रीन को फोकस किया तो एक झूला दिखा जो शायद तेज़ हवा से हिल रहा था,शायद किसी स्कूल का रहा होगा।आधा आसमान बिलकुल लाल और सुनहरे रंग की रौशनी से जगमगा रहा था और बाकी के आधे पर तारे खिले हुए थे। 101 ने आसमान की और देखा तो चाँद दिख ही नहीं रहा था। उस महिला की आवाज़ आयी उसने कहा,” 2047 में इंसान चाँद पर जा कर रहने लगा था और 2070 तक उसने चाँद पर अपना स्थायी ठिकाना बस लिया था,लेकिन जब 3014 में पूरी दुनिया लड़ पड़ी तो चाँद भी उस से बच नहीं पाया और चाँद को भी परमाणु हत्यारों से नष्ट कर दिया गया”। कुछ देर बाद तारों के बीच कुछ चमकदार चीज़ नज़र आने लगी। 101 ने पूछा,” ये क्या है सारा? महिला की आवाज़ आयी,” क्या कहा तुमने? 101 ने दोहराया,”ये क्या है? उस होलोग्राफिक महिला ने फिर पूछा,” नहीं,ये नहीं,तुमने मुझे किस नाम से बुलाया? 101 ने कहा,” सारा! क्योंकि तुम सरस्वती की बराबरी नहीं कर सकती इसलिए तुम्हारा नाम आज सारा,इसे भी तुम अपने डेटाबेस में डाल लो,अब ये बताओ की आसमान में वो क्या है? सारा ने कहा,” ठीक है लो कर लिया फीड मैंने अपने डेटाबेस में। और वो जो बिखरे हुए धुल जैसी चमकदार सुनहरी रेखा आसमान में जगमगा रही है वो चाँद का अवशेष है,अब बस धुल ही बची है जिसे आज से 300,000 साल बाद गृतवाकर्षण फिर से गोलाकर पिंड बना देगा पर उसे चाँद बुलाने वाला पृथ्वी पर कोई भी न होगा”। 101 ने सामने देखा तो बारिश धीमी हो रही थी,आसान में हलके बादल थे और लगातार बिजली बिना रुके चमक रही थी जिसके साथ बादल भी बिना रुके लगातार गड़गड़ा रहे थे पर और भी बादल आ रहे थे। 101 ने पूछा की हम किस देश में हैं। सारा ने कहा,” अभी जहां तुम खड़े हो वो हिन्दमहासागर का तल है,परमाणु हथियारों के विस्फोट से निकली हुई गर्मी ने दुनिया के सारे महासागरों को सुखा दिया है,अब सिर्फ एक ही सागर है जो की दक्षिण ध्रुव पर है क्योंकि वहां की बर्फ पिघल चुकी है”। 101 ने कहा,”मुझे और बताओ कि आखिर हुआ क्या है और कब हुआ है ? सारा ने कहा,” तुम आगे की ओर धीरे-धीरे अपने हथियार के साथ बढ़ते रहो, कोई खतरा होने पर मैं तम्हे बता दूंगी,तब तक तुम्हे पूरी बात बताती हूँ,”3014 में दुनिया 4 भागों में बंट गयी थी,एक- अमेरिका,दक्षिण अमेरिका और पूरा अफ्रीका,दूसरा- इंग्लैंड और यूरोप, तीसरा- रूस,भारत,ऑस्ट्रेलिया,बांग्लादेश,श्रीलंका,जापान,चीन, चौथा- मध्य एशिया,मलेशिया,इंडोनेशिया और बचे हुए बाकी के देश। उस वक़्त विश्व की आबादी 42 अरब हो गयी थी,चूँकि 2080 में खाद्य पदार्थों की पैदावार में 1960 के दशक की तरह फिर से क्रांति आयी थी तो आबादी 13 अरब से बढ़ कर 42 हो गयी थी पर आबादी बढ़ने के चलते उस वक़्त पूरे विश्व में मीठे पानी की कमी की मुसीबत आ पड़ी,सारी दुनिया अपने मीठे पानी के स्रोतों को बचा कर रखना चाहती थी जिसके चलते पानी की कमी वाले इलाकों से लोग पलायन कर दूसरे देशों में जाने लगे जिसके परिणाम स्वरुप एक विश्व स्तरीय सिविल-वॉर आरम्भ हो गया। दुनिया के देशों ने जब सिविल वॉर को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया तो कुछ कट्टर पंथ के समर्थकों ने आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बात बिगड़ती गयी और पहले 2 देश आपस में लड़ पड़े फिर 20 और फिर 200। बहुत बड़ा नरसंहार हुआ। लोग आपस में तो लड़ ही रहे थे लेकिन दुनिया की बड़ी सारकरें उन्हें रोकने के वजाए आपस में लड़ बैठीं। 3016 तक विश्व स्तर पर युद्ध छिड़ चूका था जो की आने वाले 3 -4 साल तक चला, इस दौरान किसी ने भी परमाणु,रसायनिक या जैविक हत्जियारों का इस्तेमाल नहीं किया था लेकिन 3017 में चाँद पर स्थित परमाणु फैसिलिटी के मैं कंप्यूटर को किसी कट्टरपंथी गुट ने हैक कर लिया और वहां से पृथ्वी की और 15 परमाणु मिसाईलें दाग दी,जो की पृथ्वी के 15 सबसे बड़े शहरों पर आ गिरे,उस साल सारी दुनियां में कुल मिला कर 250 करोड़ लोग मारे गए थे। सबसे ताकतवर देश चाँद को नष्ट करने को उतावले हो उठे थे क्योंकि उनकी नज़र में चाँद ने पृथ्वी से विद्रोह कर दिया था,पर चाँद की सरकार नतमस्तक भाव में इस से इनकार कर रही थी, लेकिन कुछ समझदार देश चाँद के नष्ट होने से जो पृथ्वी पर दुष्प्रभाव पड़ेगा उस अवगत थे इसलिये वे ऐसा होने नहीं देना चाहते थे। इस बात पर युद्ध और भी भयानक रूप लेने लगा था। अब लोग रसायनी हत्यारों का इस्तमाल करने लगे थे,जिस से पृथ्वी का वायुमंडल पूरी तरह दूषित हो गया। गंभीर स्थिति को देखते हुए युद्ध तुरंत ही रोक दिया गया और विश्व के सभी 200 देशों ने मिलकर एक वार्ता बुलाई की इसका हल कया हो,लेकिन कुछ और ही होना था। 21 दिसम्बर 3017 को वह वार्ता होनी थी और हो भी रही थी,उस वार्ता को अंटार्टिका में बनाये गए नेशन 200 हाउस नामक बिल्डिंग में होना था। उस दिन दोपहर के दो बजे खबर आयी की चाँद को नहीं नष्ट किया जायेगा और अब लड़ाई बंद कर दी जायेगी,मीठे पानी के सभी स्रोत को दुनिया के सभी लोगों के लिए उपलब्ध कराया जायेगा। लोग अपने घरों में बैठ कर इसका प्रसारण देख ही रहे थे और खुशियां भी मना रहे थे की अनहोनी हो गयी। न जाने कहाँ से और किसने एक साथ 6 परमाणु मिसाइल नेशन 200 बिल्डिंग और अंटार्टिका की और दाग दिए और सब कुछ खत्म हो गया। दुनिया ने समझा की ये फिर से चाँद के वासियों ने किया है और उसे नष्ट कर दिया। इसके बाद जो देश चाँद को नष्ट करने के विरोध में थे उन्होंने बाकी के देशों पर परमाणु,रसायनिक और जैविक हथियारों से हमला कर दिया। जवाबी कार्यवाही में भी वही हथियार चले और सारी सृष्टि नष्ट हो गयी”। 101 रुक गया उसके सामने एक विशाल मैदान था,जिसके यहां-वहां ईंट के इग्लू नुमा घर थे।उसने सारा से पूछा ये क्या चीज़ हैं? सारा ने जवाब दिया,” ये जो तुम देख रहे हो इसमें परमाणु युद्ध के बाद बचे लोगों ने अपने परिजनों के मृत शरीर को रखा है।यहां इस मैदान में हज़ारों ऐसे इग्लू नुमा घर मिल जायेंगे,इस मैदान की लंबाई और चौड़ाई 18 वर्ग किलोमीटर है”। 101 उस मैदान को निहार रहा था,फिर उसने पूछा,” नहीं तुम कुछ गलत कह रही हो ,इन्हें देख कर ऐसा लगता है कि की ये किए धर्म विशेष से सम्बन्ध रखते हों,और यह उस धर्म के मानने वालों का अंतिम संस्कार करने का एक तरीका हो या फिर ये कोई धर्मिक स्थल है”। सारा ने कहा,” चूँकि मैं एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता हूँ इसलिए हंस नहीं सकती लेकिन तुमने जो बात कही है उस पर कोई हंस ही देता क्योंकि दुनिया को धर्म का दामन छोड़े हुए कई साल गुजर चुके थे तब जा कर ये इग्लू नुमा बनावट बनाई गई। मैं जिस वक़्त की बात कर रही हूँ उस समय न तो कोई धर्म था,न ही रेस और न ही कोई अमीर या गरीब। यह सब विनाश मानव ने अपने सबसे समृद्ध काल में किया था, सब बराबर थे और उन्हें रोकने वाला कोई भी नहीं था क्योंकि सबको किसी दूसरे की कोई गलती दिखती ही नहीं थी। मानव जब से पृथ्वी और जन्मा था उस दिन से वह एक दूसरे की गलतियों को ढूंढता आया है, और कई लड़ाइयां गलती को ढूंढने और गलती करने वाले को जिम्मेवार ठहराने के लिए ही हुईं थीं,लेकिन ये युद्ध उन सबसे अलग था,यहाँ सब खुश थे,कोई गलतियाँ भी नहीं करता था और न ही किसी को जिम्मेवार ठहराया जाना था,फिर भी दुनिया खत्म हो गयी”। 101 फिर से बोला,” सारा तुम भले ही अब तक की सारी बातें जानती होगी लेकिन तब भी तुम गलत हो,क्योंकि जब सब कोई खुशहाल थे तो फिर क्यों लड़ पड़े?। सारा ने जवाब दिया,” वे इसलिए लड़ मरे क्योंकि उनके बीच एक होड़ छिड़ गई थी,इस बात की होड़ की चाँद पर जवाबी हमला हो या नही। और इस बात को लेकर की कौन सही है,क्योंकि सब बराबर थे सब कोई खुद को किसी से कम नहीं समझते थे, इसका परिणाम यह हुआ की वे सब आखिर कार लड़ मरे गए,….. अरे रुको सामने कोई है मुझे चेक करने दो”। सारा आगे 200 मीटर तक का जायज़ा ले रही थी,101 की बांह पर लगी स्क्रीन पर एक रेडियो सिग्नल आया। 101 ने अपने हेलमेट पर लगे कान के पास एक बटन को दबाया तो वह सिग्नल उसके हेलमेट में बजने लगा, वह सिग्नल था,”मैं 664 स्ट्राइक फ़ोर्स का कमांडर बात कर रहा हूँ, कट्टरपंथियों ने पूरी दुनिया पर 80-85 जैविक,रासायनिक और परमाणु हथियार चलाये हैं, नागरिकों से अनुरोध है कि वे अपने घरों में रहें,सड़क पर न निकलें,अपने बच्चों और महिलाओं का ध्यान रखें,आपकी सेना और सरकार आपके साथ है”। यह संदेश बार-बार दोहरा रहा था फिर खुद ही बंद हो गया। सारा ने कहा,” ये कुछ नहीं है,700 साल पहले किसी ने रेडियो ट्रांसमीटर से यह संदेश भेजा था जो यहां से 90 मीटर पर है और यह संदेश एक रेडियो में आज भी चल रहा है,शायद वहाँ कोई सैनिक पोस्ट रही हो,आगे बढ़ते रहो पर सावधान रहना,यह दुश्मन की चाल भी हो सकती है”। 101 ने फिर पूछा,”700 साल से रेडियो कैसे चालू है,उसकी बैट्री खत्म नही हुई क्या? सारा ने कहा,”वह ट्रांसमीटर 3400 ईसवीं में बनाया गया था जिसमे रेडियो सिग्नल ही रेडियो ट्रांसमीटर के लिए ऊर्जा स्रोत का काम करती थी”। 101 ने सवाल किया आज कौन सा साल है? सारा थोड़ी चुप हो गयी और फिर बोली,” मुझे मालूम था कि तुम ये सवाल ज़रूर करोगे। देखो चाँद के ख़त्म होने के बाद पृथ्वी अपनी सूरज की ऑर्बिट से एक छोटे पत्थर की भांति छिटक गयी और अपनी धूरी पर न घूम कर अजीब ही तरह से घूमने लगी,धरती की चुम्बकीय शक्ति पर भी इसका प्रभाव पड़ा और 8 महीने के लिए चुम्बकीय शक्ति चली गयी। इसका फल ये हुआ की सूरज से आने वाली रेडियोएक्टिव तरंगे जो धरती की चुम्बकीय शक्ति से दूर कर दी जातीं थी वे सीधे धरती पर पड़ने लगी जिसके कारण उस वक़्त धरती की सतह पर मौजूद 93% जीवित जीव क्षणों में भून गये। जो कुछ बचे थे उन्होंने धरती के अंदर बसने की आदत बन ली। धरती के अंदर रहते हुए इंसानों ने कृत्रिम ढंग से पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति लौटाने की कोशिश तो की जो कुछ हद तक लौट भी आई पर पृथ्वि की धुरी को न सुधार सके जिसके चलते आज सुरज उत्तर-पश्चिम से निकलता है और दक्षिण-पूर्व में ढलता है। वातावरण और ओजोन परत नष्ट होने के कारण दिन के वक़्त सतह का तापमान 156 डिग्री सेल्सियस होता है और रात में शुन्य से 30-35 डिग्री कम। दिन भर यह अम्लीय वर्षा होती है,तापमान बढ़ रहता है,कहने को ये हमारी धरती है लेकिन अब नर्क के दर्शन देती है। और रहा तुम्हारे सवाल का जवाब तो ये साल 3793 है। to be continued…..

कल


“कल”,….मौसम के समान तू भी बदलेगा

तुझे भी तोड़- मरोड़ कर वक़्त बढ़ेगा

अकड़ के साथ जो तू इंसानों के भविष्य को

अपनी मर्जी से बदलता रहता है

क्षमता से मानव अपनी तुझे भी बदल सकता है

अरे “कल”,तू पहले देता है दरिद्रता,

देता तू परेशानियां,तू सुनाता है धित्कार

लेकिन इंसान दृढ़ता से अपनी

है करता तुझे दरकिनार , तेरी और इंसान की लडाई

चलती रही है और आगे भी चलेगी

पर इंसानों के आगे तुझे “कल” हार मान नी ही पड़ेगी

                                                          -शिशिर पाठक

Thoughts…

Let the life come into sunshine           With dreams and aspirations in your mind

Life is hard but still its divine                Like a holy mountain shrine

Stop your craving for more                         Be happy with what you have in store

Waves will definitely strike the shore Wait for you turn in front of the door

In the mean time you must behave       You must perform the acts of brave    Like a leo in his cave                               Until your name in history books is engraved…

                                          ~shishira pathak

बेनाम…

 


हर रोज़ की तरह आज भी प्रशांत बाबू अपने दफ्तर से लौटने की तैयारी कर रहे थे। शाम के 6 बज रहे थे और लगभग रोज़ ही प्रशांत बाबू इस वक़्त तक किसी भी हाल में दफ्तर से निकल ही जाते थे,पर, इतनी हड़बड़ाहट होते हुए भी वे अपने काम के प्रति पूरी ईमानदारी रखते थे। सीढ़ियों से उतर कर वो अपने दफ्तर के नीचे नुक्कड़ पर 4 रुपये की कुल्हड़ वाली एक चाय पीते और साथ में कड़ाही में तलते हुए गर्मा-गर्म समोसे का इंतज़ार करते थे;वे चाय उस वक़्त तक नहीं लेते थे जब तक समोसे उनके हाथों में न आ गए हों, इस बीच वे समोसे को तलते हुए बड़े चाव से देखते,कुछ लोग आपस में बातें करते रहते थे ,लेकिन प्रशांत बाबू के लिए उस वक़्त गैस स्टोव की आवाज ही एकमात्र ध्वनि का श्रोत होती थी। समोसे तैयार होने के बाद वे 2 समोसे खरीद कर वहीं पर बड़े चाव से उनका सेवन करते,जो अपने आप में बड़ी निराली चीज़ थी,निराली इसलिए क्योंकि वे चाय की चुस्की और समोसे के निवाले को एक साथ लिया करते थे,पहले समोसे का निवाला और फिर साथ ही साथ मीठी चाय की चुस्की। कुल्हड़ वाली चाय को ही लेना पर्यावरण के प्रति उनकी सजगता को दर्शाता था। शहर में शाम के वक़्त लाखों की भीड़ के बीच वो कंधे पर अपना चमड़े से निर्मित बैग टाँगे हुए बस स्टैंड की ओर निकल पड़ते थे,रास्ते में कोई -न-कोई जान पहचान वाला मिल ही जाता था और क्रिकेट या राजनीती की बात छिड़ जाती थी। हम भारतवासियों को अपना समय बिताना हो तो क्रिकेट या राजनीती ही दो ऐसे विषय हैं जो टाइमपास की कसौटी पर खरे उतरते हैं, और हमें इन विषयों पर हमें तर्क- वितर्क या टिप्पणियाँ करना बड़ा आनंददायी भी लगता है।बस स्टैंड तक पहुंचने में 15 मिनट लग जाते थे,और फिर प्रशांत बाबू वहाँ एक सीट पर बैठ कर सवेरे के अखबार को निकाल जो बची-कुची सुर्खियाँ रह जाती थीं उन पर भी अपनी पैनि नज़र दौड़ा लिया करते थे। प्रशांत बाबू दूरभाष विभाग में लिपिक के तौर पर कार्यरत थे। उन्हें अभी काम करते हुए 7-8 महीने ही गुज़रे थे।उनकी शादी नहीं हुई थी इसलिए वो शहर में एक कमरा किराए पर ले कर रह रहे थे।वो अपना खाना-पीना खुद ही तैयार करते थे। उनके जीने की शैली बहुत ही सरल थी जो की उन्होंने अपने पिता से सीखी थी।उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे और कई बार स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल भी भेजा था।इसलिए प्रशांत बाबू भी बहुत ही ईमानदार,कर्मठ और संस्कारवान व्यक्ति थे। उनके पहनावे में उनकी सरलता झलकती थी।वह कुर्ता पैजामा और ऊपर से एक खाकी रंग की बंडी,कलाई पर अपने बाबूजी की दी हुई एच.एम. टी  की घडी जो की यदा-कदा ही बैटरी बदलने को कहती थी,आँखों पर काले रंग का मोटा सा चश्मा,और काले रंग की मोटी-मज़बूत,टिकाऊ रबर की चप्पल। हर रोज़ की तरह आज भी वह स्टैंड पर अख़बार ही पढ़ रहे थे की उनकी नज़र एक भिखारी पर पड़ी जो वहाँ उपस्थित लोगों से भिक्षा याचना कर रहा था। उसके हाथों को देख कर लग रहा था कि वो कुष्ठरोग से पीड़ित हो। वह भिखारी स्टैंड पर खड़े या बैठे सभी लोगों के सामने जाता और मुस्कुरा कर रह-रह कर बोलता,” ऐ मालिक, 2 रूपया दे दे ,आज कु छ नहीं खाया हूँ  “,  लेकिन स्टैंड पर सभी लोग यह बोल कर की, पैसे नहीं हैं ” उसे भगा देते। थोड़ी देर बाद वो भिखारी प्रशांत बाबू के सामने भी आया और भीक्षा याचाना करते हुए  मुस्कुरा कर वही वाक्य उसने फिर से दोहराये,पर,उसकी करुण याचना प्रशांत बाबू के कानों में नहीं गयी,वह उसे देख कर स्तब्ध रह गए थे। एकदम काला रंग,पट्टी बंधी उँगलियाँ जिन पर मख्खियां भिनभिना रहीं थीं,ललाट पर एक घाव जिस से मवाद रिस रहा था ,गंदे धुल से लट-पट बाल जो मानवीय शरीर के तेल और धुल से कठोर हो  चुके थे, सफ़ेद हो चुकी पसीने से सनी मटमैली ढाढ़ी,गले पर मानवीय मृत चमड़ी, धूल , चेहरे पर  झुर्रियां जो की गन्दगी और पसीने के कारण अमानवीय प्रतीत हो रही थीं,टूटे हुए पीले हो चुके बेतरतीब दाँत,होठों पर जमी हुई पपड़ी, आँखों में आंसू के साथ मिला हुआ आँखों का मैल जो की आँख के किनारे से ढलक रहा था, पसीने से भीगा हुआ दुर्गन्ध देता शरीर,एक कटी हुई टांग जिस पर पट्टी बंधी थी,धड़ पर एक काली-पीली सी पूरे बांह की बीना बटन वाली शर्ट जो फट चुकी थी,और नीचे एक सफ़ेद रंग की जो मिटटी के रंग की हो चली थी ,जहाँ-तहाँ से फटी और घिसी-पीटी कहने को पैंट। वह भिखारी  कुछ देर वहीं पर खड़ा रहा पर कुछ पैसे नहीं मिलने के चलते वह से भी आगे निकल गया,लेकिन फिर अचानक से उसने अपन सिर घुमाया और प्रशांत बाबू की ओर देख कर अपना सिर हिलाता हुआ प्रशांत बाबू को देख मुस्कुराने लगा।यह देख प्रशांत बाबू थोड़े डर गए और विचलित भी हो गए।तभी उनकी बस आ गयी,और सभी यात्रियों के साथ वो भी बस पर चढ़ गये।बस अपने गंतव्य स्थान को निकल गयी पर अभी भी प्रशांत बाबू बस की खिड़की से झाँक कर उस भिखारी को देख रहे थे और वह भिखारी भी उन्हें देख सिर हिलाता हुआ मुस्कुरा रहा था।

             बस कुछ देर में अपने गंतव्य तक पहुँच गयी थी।प्रशांत बाबू बस से उतार गये और अपने किराये के कमरे की ओर अपने कदम बढ़ाने लगे।प्रशांत बाबू अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए काफ़ी चिंतित थे,वह मन ही मन खुद से सवाल कर रहे थे ,की कोई इतने कष्ट में कैसे मुस्कुरा सकता है,जिसका पूरा शरीर दुर्गन्ध कर रहा हो,जहाँ-तहाँ घाव हों,मुखमंडल पर उसके  मुस्कुराहट कैसे आ सकती है, कोई भी उसे भीख देने को तैयार नहीं हो रहा था,फिर भी उसमें जीने की इतनी चाहत कैसे थी?  ये सवाल प्रशांत बाबू के मन को टटोल रहे थे। वैसे तो वे रोज़ाना किराने की दूकान से एक पैकेट दूध खरीद कर अपने कमरे की ओर जाते थे पर आज वे किसी और ही चिन्तन में थे। रह-रह कर उस भिखारी का चेहरा उनके सामने आ जाता था।थोड़ी देर बाद वे अपने कमरे तक पहुँच गये,और आदतन हाथ मुंह धोये,कपड़े बदले और कुर्सी पर बैठ गए,वे एकदम चुप थे और कमरा एकदम शांत था। वे यही बातें सोच रहे थे की आख़िर ऐसी क्या बात है जो उस भिखारी को ज़िंदा रखे हुई थी,इस कष्ट में भी वह दिन भर एक लाठी के सहारे भिक्षाटन करता रहता है। वे यह भी सोच रहे थे की वह भिखारी क्या खाता होगा,कितना खता होगा,कहाँ रहता होगा,अपना जीवन कैसे चलाता होगा। क्या उसकी देख-रेख करने वाला कोई नहीं इस संसार में,अभी तक जिस से भी उसने भिक्षा याचना की होगी,क्या किसी ने भी उसके घावों पर दवा नहीं लगाई ? क्या उसे पीड़ा का अनुभव नही होता,या फिर वो पीड़ा,कष्ट,बिमारी,स्नेह आदि ,जो की जन सामान्य और  यहां  तक की  पशुओं  के लिए भी हज़ारों  साल आपस में प्रतिस्पर्धा का विषय और कारण बने रहे हैं, इन चीज़ों से ऊपर उठ चुका है? और अगर हाँ तो आखिर क्यों?  इस तरह के सवाल प्रशांत बाबू के मन में घूम रहे थे, धीरे-धीरे घडी की सुई 12 पहुँच गयी,और कुछ देर बाद प्रशांत बाबू कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गए।

                                    सुबह हो गयी थी ।प्रशान्त बाबू के कमरे के पास एक बड़ा सा उढ़ल का पेड़ था जिसपर कुछ सुन्दर लाल फूल खिले हुए थे। सवेरे- सवेरे चीड़ीयाँ उस पेड़ पर आ कर चहचहातीं और चींटियों की दावत उड़ातीं थीं। उढ़ल के पेड़ के नीचे छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा था जो की सीमेंट- बालू और रोड बनाने की प्रक्रिया से बाचा रह गया था। उस छोटे से भाग पर कुछ घांस भी उगी हुई थीं,घास पर सुबह की ओस की बूँद और कुछ कीट-पतंगे घुम रहे थे। साथ ही साथ कभी- कभी वहां केंचुए भी निकल आते थे। इन सब जीव-जंतुओं की बहुतायत होने की वजह से वहां हर सुबह गौरैयों का तथा मैनाओं का जमावड़ा लगा रहता था और सारे मिल कर खूब कलरव करते थे। बगल में ही आम का एक विशाल पेड़ था। हवा के तेज़ बह रही थी , और हव् के आम के पत्तों के बीच से हो कर गुजरने से सरसराहट की आवाज़ हो रही थी। पक्षियों का कलरव और पेड़ की सरसराहट की आवाज़ का मिश्रण बड़ा ही मधुर था और वातावरण में दूर तक गूँज रहा था। थोड़ी देर बाद इन सब पक्षियों के चहचहाने से प्रशांत बाबू उठ गए। यह हर रोज़ का नियम था,प्रशांत बाबु को उठाने के लिए सुबह-सुबह चीड़ीयाँ आ ही जाया करती थीं। प्रशांत बाबु ने बीछौने  से उठकर अपने कमरे का पर्दा हटाया और सूरज की रौशनी ने कमरे को जगमगा दिया। सुबह के कार्यक्रम को निपटाने के बाद वे अपने दफ़्तर को निकल लिए। अपने कमरे से निकल कर प्रशांत बाबू बस स्टैंड की और बढे पर अभी भी उनका मन अशांत ही था। चलते-चलते वह बस स्टैंड पर पहुँच गये,पर कुछ सोंच रहे थे। थोड़ी देर बाद बस आयी और वे बस में बैठ गये। बस कंडक्टर आया तो प्रशांत बाबू ने 10 रुपये के वजाए 500 रूपये निकाल कर दे दिए। कंडक्टर ने 10 रुपये का टिकट बनाया और पैसे काट कर बैलेंस लौटाने के लिए अपनी बैग को टटोला लेकिन उसे खुल्ले रूपयों के नोट नहीं मिले, खुल्ले लौटाने के लिए उसने बाकी के यात्रियों से अनुरोध किया कि शायाद कोई 500 रुपये के नोट के खुल्ले कर दे,लेकिन सुबह का वक़्त होने के कारण किसी ने उसकी मदद नहीं की। हार कर कंडक्टर ने प्रशांत बाबू को 500 का नोट लौटा दिया। इतना सब हो रहा था लेकिन प्रशांत बाबू किसी और दुनिया में खोए हुए थे।उनके दिमाग से उस भिखारी का ख्याल जा ही नही रहा था। कन्डक्टर ने उन्हें हिलाते हुए कहा,” अरे भैया 500 का खुल्ला नहीं है,10 रुपये अगर हैं तो दे दो”। प्रशांत बाबू बस कंडक्टर की ओर देख रहे थे लेकिन उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था।तभी कंडक्टर की ओर किसी ने 10 रूपये के दो करारे नोट दिए और कहा,”ये लो भाई 10 रुपये मेरे और प्रशांत भाई के,और जल्दी से टिकट बना कर दो”। प्रशांत बाबु ने घूम कर देखा तो उनके सहकर्मी  निमेष जी मुस्कुराते हुए,बाएं  कंधे पर पिट्ठू लटकाये और बायीं हाथ से बस का रॉड पकडे हुए दायीं हाथ से कंडक्टर को पैसे दे रहे थे। अपने सहकर्मी को देख कर प्रशांत बाबु के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई, उन्होंने कहा,” यार तुमने पैसे क्यों दे दिए,मैंने तो दिए ही थे,कंडक्टर टिकट बना ही तो रहा था”। निमेष जी ने हस्ते हुए कहा,” भाई  प्रशांत मैं इस बस में काफी देर से तुम्हे देख रहा हूँ,परिचालक को तुमने टिकट के पैसे तो दिए पर सवेरे-सवेरे आखिर बेचारा परिचालक 500 रुपये का खुल्ला कहाँ से लाये”। प्रशांत बाबू ने अचंभित होते हुए पूछा,” कौन से 500 रुपये!!? लेकिन किराया तो 10 रूपये है,मैं हर रोज़ इतने में ही सफर करता हूँ,और तुम किस 500 रूपये की बात कर रहे हो?” निमेष जी ने उत्तर दिया,” बंधू ज़रा अपना बटुआ चेक करना तो”। प्रशांत बाबू बोले,” इसमें बटुआ क्या चेक करना?” निमेष जी ने कहा, भाई देखो,तुमने शायद गलती से परिचालक को 500 का नोट दे दिया है जिसका खुल्ला करने में परिचालक महोदय असफल हैं,परिचालक महोदय ने तुम्हे अपनी व्यथा बताई पर तुम तो आज किसी और दुनिया में हो और मूक दर्शक भांति चुपचाप बैठे हुए हो, तुमने परिचालक की बात भी नहीं सुनी इसलिए मैंने बस का किराया दे दिया”। प्रशान्त बाबू बोले,” मतलब की तुम्हारे मुताबिक ये 500 का नोट मेरा है?”। निमेष जी ने जोर देते हुए कहा,”जी हाँ और अगर विश्वास नहीं होता है तो  एक बार तसल्ली कर ही लो यार,बटुआ भी तुम्हारा है,नोट भी और जेब भी”। प्रशांत बाबू ने कहा,”इसमें कौन सी बड़ी बात है,ये लो”। प्रशांत बाबू ने अपना बटुआ चेक किया लेकिन उसमें 500 का नोट नहीं था। प्रशांत बाबु घबरा गए,और निमेष जी की ओर चिंतित मुद्रा में देखने लगे और बोले,” यहीं तो होना चाहिए,कल ही तो रखा था,कहाँ जा सकता है”। निमेष जी ने कंडक्टर के पास से 500 का नोट लिया और बोले,”ये लो बंधू,ये है तुम्हारा नोट, ध्यान से रुपये निकाला करो,वो तो परिचालक महोदय ईमानदार प्रतीत होते हैं,नहीं तो नोट वापिस नहीं मिलता”। इसपर कंडक्टर ने पूछा,” सर जी,ये परिचालक किसे बोल रहे हैं, और ये होता क्या है? निमेष जी कुछ सेकंड तक कन्डक्टर की ओर देखते रहे,और कंडक्टर मुंह बाए उनकी ओर देख रहा था। इन क्षणों के बीच ड्राइवर बस के सात सुर  वाले हॉर्न को बजाता हुआ बस को भगा रहा था। निमेष जी ने चिढ़ कर उत्तर दिया,”अरे महाशय परिचालक यानि कंडक्टर”। बस में यात्रि ये सब देख रहे थे। कंडक्टर ने फिर कहा,”ओ…. अच्छा, परिचालक यानी कैंडेक्टर !!!, पीछे के बैठे कुछ स्कूल जा रहे बच्चों ने ज़ोर से कहा,हाँ.. कैंडेक्टर हा….हा… हा …।  यात्रीगण मध्यम भाव में हंस पड़े और प्रशांत बाबू भी, उन्होंने  निमेष जी से सवाल किया ,” ये सब तो ठीक है लेकिन  क्या ये 500 का नोट मेरा ही है?” निमेष जी, कंडक्टर और अगल- बगल के कुछ लोग जी हां….. बोलते हुए हंस पड़े। प्रशांत बाबू भी अब थोड़े शांत हो गए थे,और नोट को बटुए में रख लिया,और 10 का नोट निकाल कर निमेष जी को देने लगे,इसपर निमेष जी ने कहा,”अरे भाई,इसे रखो अपने पास,इतना ही हिसाब-किताब रखना ह तो शाम को समोसे खिला देना,हे…हे…हे…।

                          निमेष जी और प्रशांत बाबू टिकट लेने के बाद आपस में बातें करने लगे। प्रशांत बाबू तो सीट पर बैठे हुए थे लेकिन निमेष जी को खड़ा ही रहना पड़ा। प्रशांत बाबू ने निमेष जी का पिट्ठू अपनी गोद में रख लिया और निमेष जी आराम से बिना बोझ के सफर का आनंद लेने लगे। चूंकि बस चार्टर्ड थी इसलिए बस में भीड़ नहीं थी,लेकिन सारी सीटें पहले से ही ले ली गईं थीं। 2-4 व्यक्ति बस में खड़े थे उनमें से एक निमेष जी भी थे। प्रशान्त बाबू ने अपने मित्र को कुछ देर अपनी सीट पर बैठने का आमंत्रण भी दिया पर निमेष जी ने हँसी मज़ाक में टाल दिया। दोनों के बीच ऑफिस की बातें, और हंसी-मजाक होने लगी। बातों- बातों में समय कब बीत गया पता ही नहीं चला। बस रुक गयी और यात्रीगण बस से उतर गये। निमेष जी और प्रशांत बाबू की दोस्ती देखते ही बनती थी। दोनों कोई हंसी- मजाक, क्रिकेट और राजनीति की बातें करते हुए अपने दफ्तर की ओर बढ़ रहे थे।प्रशांत बाबू के अंतर्मन से उस भिखारी की छवि लगभग जा चुकी थी।वे अपने अंदाज में आ गए थे,दफ्तर जाने से पहले वे नुक्कड़ पर रुक एक कुल्हड़ गर्मा- गर्म चाय अवश्य पिया करते थे। आज चूँकि निमेष जी भी साथ थे तो उन्होंने ही आज एकसाथ चाय पी कर दफतर की दहलीज को पार करने का प्रस्ताव रखा। निमेष जी जा कर समोसे खरीदने लगे पर प्रशांत बाबू ने उन्हें रोक दिया और कहा,” अरे बँधु थोड़ा सब्र करो,गर्म तेल हुए समोसे निकलने ही वाले है,इन ठन्डे पड़े हुए गर्माहट विहीन समोसे की तुरंत के तले हुए गर्म समोसों के आगे क्या औकात है। तनिक रुको गर्म समोसे अभी थोड़ी ही देर में प्रकट होने वाले हैं उनके साथ मीठी दुध वाली चाय का मजा ही कुछ और होता है भाई। देखो शायद तुम्हे ये नही मालूम की चाय और समोसो का मजा कैसे लिया जाता है,लगता है कि तुम्हे ये विद्या बताने की ज़रुरत है”। निमेष जी बोले,” ये कौन सी विद्या है,ज़रा मैं भी तो जानू”। प्रशांत जी ने मुस्कुरा कर कहा,” इस विद्या को सीखने के लिए चाय और समोसे का खर्च आपको की वहन करना होगा,इसे आप गुरु दक्षिणा समझ के दे दें”। निमेष जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा,”जो आज्ञा गुरुदेव,मैं सुबह के नाश्ते का खर्च तो वहन कर ही लूंगा,साथ ही साथ आज शाम को आपकी सीखाई हुई रहस्यमयी और गूढ़ विद्या को आजमाने के लिए शाम के नाश्ते का खर्च भी मैं ही वहन करने को तैयार हूँ”। इन दोनों की बाते आस- पास के लोग सुन रहे थे। जैसे ही हलवाई ने गर्म समोसों को निकाला निमेष जी ने बिजली की गति से उन्हें खरीदा और पत्तल में रख लेते आये,इधर प्रशांत बाबू ने जल्दी से गर्म चाय से भरे दो कुल्हड़ लिए। निमेष जी बोले,”गुरुदेव शिक्षा ग्रहण करने के लिए मैं तत्पर हूँ और आप जैसे अनुभवी खवैये से नयी खाद्य विद्या सीखने के लिए अत्यधिक उत्सुकता का अनुभव कर रहा हूँ”। प्रशांत जी के मुखमंडल पर एक अत्याधमिक तेज खिल उठा, और वे बोले,”तुम्हारी सारी व्यकुलता और उत्सुकता का ईलाज इस समोसे में है,देखो इस गर्म भाफ निकलते हुए समोसे को,इसके अंदर आलू और मसालों का मिश्रण है,जो की हमारी जीवा को आनंद देने के लिए हलवाई महोदय ने तैयार किया है,एक निवाला ऊपर की नोक से लो और थोड़ा सा 4-5 सेकंड के लिए चबाओ फिर दूसरे हाथ में पकडे हुए चाय के कुल्हड़ से मीठे अमृत रुपी चाय की एक चुस्की लो,फिर जो सोमोसे का और चाय के स्वाद का आनंद तुम्हे मिलेगा उसे शब्दो में लिखा नही जा सकता है”। इतना बोल कर दोनों ने समोसे का एक निवाला लिया और चाय की चुस्की ली, उन्हें देखेने वाले अगल-बगल के लोगो ने भी वैसा ही किया,और चाय की चुस्की लेने की सुर्रर्रर्रर… सुर्रर्रर्र की आवाज 10- 15 जगहों से 1 या 2 सेकेंड के विराम के बाद आने लगी। इधर् इन दोनों के देख हलवाई ने भी समोसे और चाय की चुस्की ले ही ली। इन्हें देख निमेष जी और प्रशान्त बाबू हंस पड़े और इन दोनों को हँसता देख समोसे और कुल्हड़ को पकडे बाकी के लोग और हलवाई महोदय की भी हंसी रुक नहीं पायी।

                 माहौल में हंसी की आवाज़ अभी तैर ही रही थी की प्रशांत बाबू ने पलट कर देखा और उनकी नज़र उसी भिखारी पर पड़ गयी। वह भिखारी  समोसे वाले से समोसे की भीख मांग रहा था। एक लाठी के सहारे खड़े हो कर विचित्र मुद्रा में अपने सर को हिलाते हुए,चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए कभी अपने पेट को छूता तो कभी निवाला लेने की मुद्रा में अपनी उँगलियों को समेट कर अपने मुँह के पास लाता।ऐसा वह बार-बार दोहरा रहा था।उसे भूख लगी थी,पर हलवाई उसे दुत्कार रहा था और डाट कर भगा रहा था।समोसों को तलता देख और जानलेवा भूख के मारे उसने निकाले हुए समोसों में से एक समोसा उठा लिया और खाने लगा। समोसा गर्म था और उसका मुँह जल गया और उसने खाये हुए निवाले को थूक दिया ,शायद वह खाने के तरीके भी भूल चुका था। इतना देख हलवाई ने उसे ज़ोर से धक्का दिया जिस से उसके हाथ से समोसा गिर कर दूर चला गया और वह खुद भी गिर पड़ा। हलवाई  ने गालियाँ बकी और उसके पेट पर ज़ोर से 2 लात मार दिए। ऐसा घटित हुआ ही था कि प्रशांत बाबू उठे और तमतमाते हुए हलवाई के पास गए और जेब से जो भी नोट निकला वो हलवाई के मुँह पर दे मारा, और गुस्से में आ कर वे बोले,” तुम आदमी हो या जानवर,एक लाचार भिखारी को मार रहे हो,एक समोसा ले ही लिया तो क्या हुआ,ये लो,जितना खा सके ये खिला दो इसे,समझे”। हलवाई भी आवेश में था,उसने भी कह दिया,” इंसान हूँ तभी मैंने ऐसा किया,अगर हर रोज़ मैं एक-एक पकवान बाँटता रहूं तो एक दिन मेरी भी हालात इस लंगड़े भिखारी जैसी हो जायेगी”। प्रशांत जी और भड़क उठे और लाल-पीले होते हुए हलवाई की ओर दौड़ पड़े,लेकिन निमेष जी ने उन्हें रोक लिया और मामले को तुरंत रफा-दफा किया। अपने मित्र को उन्होंने शांत किया और प्रशान्त बाबू के आवेग में आ कर दिए हुए पैसे उन्हें वापिस लौटा दिए। निमेष जी ने पूछा,”इतने गुस्से में मैंने आजतक तुम्हें नहीं देखा,क्या बात हो गयी?” प्रशांत बाबू ने कोई उत्तर नहीं दिया,वे उस भिखारी को देख रहे थे,भिखारी को ज़ोर की चोट लगी थी,जिसका प्रमाण उसके पेट से निकली उलटी थी,वह अपने पेट को पकड़ा हुआ ज़मीन पर पडा हुआ रो रहा था। कुछ क्षणों के बाद वह अपनी लाठी के सहारे उठा और बाकी के बचे हुए मिट्टि से सने समोसे के आलू को उठा कर खाने लगा और रोते हुए वहां से चला गया।

                           निमेष जी ने अपनी घड़ी देखी और बोले,” चलो अब दफ्तर चलते हैं,साहब के आने का समय हो चला है,कहीं देर हो गयी तो डाट खानी पड़ेगी। वायदे के अनुसार निमेश जी ने नाश्ते का खर्च दे दिया। दोनों मित्र सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने दफ्तर जा रहे थे,निमेष जी हंसी मजाक करने को कोशिश करते पर प्रशान्त बाबू बड़े ही गंभीर मुद्रा में हाँ…हाँ.. कर बात टाल देते।दिन भर  का काम रोजों की तरह चल रहा था। धीरे-धीरे वक़्त अपनी चाल चलता हुआ आगे बढ़ रहा था और देखते ही देखते शाम हो गयी। उधर वह भिखारी हमेशा की तरह भीख मांगता हुआ बस स्टैंड पर घूम रहा था लेकिन हमेशा की तरह कोई उसे भीख नहीं दे रहा था।तभी कुछ शरारती बच्चे जो उसे पगला-पगला बुला कर छेड़ा करते थे वे आज भी उसे छेड़ रहे थे।वह भिखारी उनसे दूर भागने की कोशिश करता पर बेचारा लंगड़ा भिखारी भाग नहीं पाता। थोड़ी देर बाद वे लड़के उसे छोड़ कर चले गए। वह भिखारी थक गया था और बस स्टैंड के पास नीचे बैठ गया, उस दिन धूप बहुत कड़ी थी।थोड़ी देर में उसे नींद भी आ गयी। अचानक एक शरारती लड़का आया और उसने उस भिखारी को उठाया और एक लड्डू दिखाया। लालच में आ कर भिखारी ने उससे लड्डू लिया और खा लिया। थोड़ी दे बाद उसी लड़के ने थोड़ी दूर खड़े हो कर भिखारी को एक और लड्डू दिखाया। लालच और भूख के मारे भिखारी खड़ा हो गया और उस लड़के के पास जा कर उस से लड्डू ले लिया और खाने लगा। तभी एक और लड़का सड़क के उस पार अपने हाथों में लड्डुओं का पूरा डिब्बा लिए भिखारी को चिढ़ाते हुए दिखाने लगा।भिखारी जिसने सालों से चीनी का एक दाना तक नहीं खाया था लड्डू के डिब्बे को देख प्रफुल्लित हो उठा,उसके आँखों से आँसु निकल पड़े। वह अपने पास खड़े लड़के के सिर पर हाथ फेरते हुए अपने हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा कर कुछ बोलने की कोशिश करने लगा पर उसके कंठ से कोई शब्द न निकले।अपने हाथ में रखे लड्डू का एक निवाला ले कर वह सड़क पर खड़े उस लड़के की ओर चल पड़ा।लड्डू को कहते हुए इस आशा में की लड्डु का पूरा डब्बा मिलेगा वह ख़ुशी के मारे रोते हुए,आसमान में ऊपर देखते हुए भगवान् को ढूंढते गले से कुछ बोलने का प्रयत्न करते हुए सड़क पार करने लगा। सड़क पर दनदनाती गाड़ियों से बचते-बचाते, बस और वाहनों के ड्राइवरों से गालियां सुनते हुए वह अपने सर को ऊपर -नीचे  की मुद्रा में हिलाते हुए लगभग उस पार पहूँच ही गया था कि अचानक उसने ऊपर सूरज की ओर देखा और उसकी आँखें चौंधिया गयी, भीड़ के बीच एक ज़ोर से ब्रेक मारने की आवाज़ आयी और सारी गाड़ियां रुक गयीं।वाहनों के हॉर्न का खूब शोर होने लगा। ट्रैफिक हवलदार  भीड़ हटाने के लिए आया और सीटी बजाता हुआ अचानक से रुक गया। वह बस भिखारी को रौंदते हुए तेज़ी से निकल गयी थी। वह डिब्बे वाला लड़का भाग चूका था। बस भिखारी का मृत शरीर वहां पड़ा था,जिस से लोग अपनी गाड़ियां को किनारे कर के निकाल रहे थे।

                                     शाम के 6 बज गये थे और प्रशांत बाबू अपने दफ्तर से निकल चुके थे।नीचे वह नुक्कड़ पर चाय पी रहे थे।तभी एक ब्रेक मारने की ज़ोर की आवाज आई। सारे लोग भाग कर रोड की तरफ गए। सड़क के उस पार एक हादसा हुआ था। कुछ लोग वहां खड़े थे तो कुछ अपने फ़ोन पर हंस-हंस कर बात करते हुए बिना कोई ध्यान दिए चलते जा रहे थे।प्रशान्त बाबू भी वहां पर पहुंचे। एक मृत शरीर ज़मीन पर खून से लतपत पड़ा हुआ था।प्रशान्त बाबू  की आँखे फटी रह गईं।उन्होंने जो देखा वह कभी भूलने लायक दृश्य नहीं था। सड़क पर बिखरे मवाद के साथ रक्त,दूर सड़क पर पड़ी हुई लाठी,आँख से निकले हुए आँसु, खुलाहुआ मुंह जिसमे चबाये हुए लड्डू का अंश था,हाथ में खाये हुए पीले लड्डू के बचे कुचे टुकड़े और रौंदा हुआ शरीर। सभी लोग चले गए पर प्रशान्त बाबू वहीं खड़े रहे।दूर से हलवाई ये सब देख रहा था।वह प्रशांत बाबू के पास आया और बोला,” पागल कहते थे सब इसे, अच्छा हुआ ऊपर वाले ने इसे अपने पास बुला लिया,काफी तकलीफ में था बेचारा। 2 साल पहले की बात है,सरकारी अस्पताल की गाड़ी आयी थी और इसे यहां फेक कर चली गयी थी।लोग कहते हैं कि इसके बेटे ने इसके इलाज की पूरी रकम नहीं दी थी, और शहर छोड़ कर भाग गया था,उसके बाद अस्पताल वालों ने इसे सड़क पर मरने को छोड़ दिया।काटी टांग पर तब से पट्टी लगी हुई थी और आज भी बंधी हुई है,यह टांग कैसे कटी किसी को नहीं पता । पहले तो थोड़ी बातें करता था पर एक दिन अचानक चुप हो गया,शायद पागल हो गया था।बहुत बुरा हुआ। इस बात का की हम कलयुग में जी रहे हैं इन्ही चीज़ों से पता चलता है,भगवान इसकी आत्मा को शान्ति दे”। प्रशान्त बाबू कुछ दूर जा कर बैठे रहे,सड़क पर लगे लाइट पोस्ट की रौशनी में भिखारी का मृत शरीर पड़ा हुआ था,उसके हाथों में जो लड्डू के टुकड़े बचे हुए थे उसे गिलहरियां आ कर खा रहीं थीं। रात के 9 बजे पुलिस मुंसिपल्टी की ऐम्बुलेंस ले कर आई और लाश को उठा कर ले गयी। प्रशान्त बाबू वही पर कुछ देर और बैठे रहे। आधे घण्टे बाद प्रशान्त बाबू ने शमशान जाने का निश्चय किया।उन्होंने बस पकड़ी और 20 मिनिट के बाद शमशान पहुँच गये। वहाँ बहुत सी लाशें जल रहीं थी। लाश जलाने वाले से उन्होंने पूछा ,”अभी कुछ देर पहले पुलिस एक लाश ले कर आई थी वह कहाँ जल रही है? शमशान पर उपस्थित उस आदमी ने कहा, “वो लाश!!!,अरे साहब ऐसा लगता है कि उसके किस्मत में तो आग भी नही है,ज़रूर बहुत पापी जीवन रहा होगा उसका,तभी मरने के बाद पुलिस ने उसे लावारिस की तरह यह छोड़ दिया। सवेरे तक तो कुत्ते हड्डियाँ तक नोच खाएंगे उसकी हे….हे….हे”। ढेर सारी जलती हुई लाशें,पुरे वातावरण में जलती हुई चमड़ी की दुर्गन्ध, दाह संस्कार के वक़्त किये जाते हुए मंत्रोचारण,मृत के परिवार जनों का विलाप और इस बीच उस आदमी को हँसता देख प्रशान्त बाबू स्तब्ध रह गए। उन्होंने उस आदमी से पुछा की वह लाश कहाँ रखी है,इशारे में उस आदमी ने उस लाश का स्थान बताया। दुखी मन के साथ प्रशांत बाबू उस लाश के पास गए,उस भिखारी का पूरा शरीर अकड़ चूका था। वह भिखारी की लाश के पास खड़े हो गए,तभी पीछे से एक आदमी आया,और पान को चबाते हुए बोला,”क्या साब,इतना लेट आते हो,थोड़ी देर और होती तो बदबू भी आने लगती,3000 रुपये दो अभी ख़ाक किये देता हूँ,एकदम हल्का रेट बता रहा हूँ,इस से कम में तो कुत्ते ही खाएंगे इसे”। प्रशान्त बाबू ने बोला,”क्या बकते हो,थोड़ा तो लिहाज करो”। इसपर उस आदमी ने कहा,”बकता नहीं हूँ साहब, वो देखो,गंगा नदी किनारे,वह जो कुत्तों का झुण्ड दिख रहा है न वे वहाँ  लावारिस लाशों की दावत उड़ा रहे हैं, ये जो पापी लोग होते हैं न साब उनके शरीर को आग भी नहीं खाती है, हाँ पर इस दुनिया से जाते हुए कुत्तों का पेट भर कर एक पुण्य का काम जरूर के देते हैं ये कर्मजले,हे…हे…हे…”,  इतना बोल कर उसने बगल में पान थूक दिया। प्रशांत बाबू ने उसे और जलती हुई चिताओं की ओर देखा,और कहा,” थोड़ी देर में आता हूँ”। वे एटीएम पर गये और पैसे निकाल कर उस आदमी को दे दिए।जैसा उसने बोला था,वैसे ही उसने लाश को अग्नि के हवाले कर दिया। भिखारी का शरीर धुं-धुं कर जलने लगा।आग की लपटें उँची उठने लगीं और धुँआ भी निकलने लगा। यह देख प्रशान्त बाबू के सामने भिखारी की हंसती हुई वही छवि आ गयी जो उन्होंने बस से देखि थी। उन्हें अब समझ आ रहा था कि भिखारी उन्हें देख कर क्यों हँस रहा था,शायद प्रशान्त बाबू ही उसका दाह संस्कार करेंगे यह बात वह किसी तरह जान चुका था। धीरे -धीरे चिता की आग तेज हो गयी और मानव का शरीर शांत हो कर अपनी अनेक दुर्गतियों में से अन्तिम गति को प्राप्त होता रहा।

                                           इधर भिखारी का शरीर जल रहा था और उधर प्रशान्त बाबू यह सोंच रहे थे की यह कौन था। कुछ देर तक चिंतन करने के बाद प्रशान्त बाबू शमशान के पंजीयन कार्यालय और गये। वहाँ जा कर उन्होंने वैम पर उपस्थित कर्मी से पुछा,” कुछ समय पहले पुलिस यहां एक भिखारी की लाश लायी थी उसका पंजीयन हुआ है क्या? कार्यालय के कर्मी ने अपना चश्मा ठीक करते हुए प्रशान्त बाबू को देखा और कहा,” आप कौन हैं,और यह जानकारी क्यों मांग रहे हैं? जलने वाला तो जल रहा है। दिखने में तो पुलिस नहीं लगते हैं आप ,और अगर पुलिस हैं तो उनके पास पहले से ही पूरी जानकारी उपलब्ध है”। प्रशांत बाबू बोले,”इसका मतलब की पुलिस को ये पता है कि वह भिखारी कौन है?” वह कर्मी फिर बोला,” हाँ बिलकुल पता है,वैसे ये नहीं बताया आपने की आप हैं कौन और ये क्यों जानना चाहते हैं? प्रशांत बाबू ने बोला की ,” मैं एक समाज सेवक हूँ और लावारिस लाशों का दाह संस्कार करता हूँ,इसलिए नाम जान ना ज़रूरी है”। ठीक है अभी बताता हूँ तनिक सब्र करो,ऐसा बोल कर वह कर्मी अन्दर के कमरे से एक मोटा सा पोथा ले कर आया,कुछ पन्ने पलटे और बोला,” नाम नहीं बात सकता क्योंकि यहां नाम लिखा ही नहीं है, लेकिन हाँ,…. घर का पता बता सकता हूँ”। प्रशान्त बाबू तुरंत बोल उठे,” तो फिर देर किस बात की , कृपया आप जल्दी से मुझे पता बताएं”। कर्मी थोड़ा मुस्कुराते हुए,और अपने चश्मे के देखते हुए बोला,” वो सब तो ठीक है पर…मगर…आप कुछ हरियाली दिखा दे तो….,आप मेरी बात तो समझ ही रहे होंगे,क्यों भाई साहब, हे…हे….हे”। प्रशान्त बाबू समझ गए और अपने जेब से 100 रुपये निकल कर दे दिए। वह कर्मी बोला,” अरे साहब इतने में तो सिर्फ पोथे के पन्ने ही पलट पाउँगा,कुछ और दे दें तो बात बन जायेगी,महंगाई का ज़माना है”। प्रशान्त बाबू समझ गए थे को ये एकदम ही निर्लज्ज आदमी है,उस से अनुरोध करना अपना समय बर्बाद करने के बराबर है। प्रशान्त बाबू ने 200 रुपये और निकले और दे दिए और खा,”लीजिये इतने में तो आपका काम हो जाना चाहिए,अभी मेरे पास इनके अलावा कुछ नहीं है”। उस कर्मी ने हस्ते-हस्ते पैसे ले लिए और बोला,” आप  देखने में तो शरीफ आदमी लगते हैं ,इसलिए चलिये हम भी थोड़ी बहुत शराफत दिखा ही दे,कोइ और होता तो 500 के नीचे काम नई बनता,हाँ तो नोट करें इनका पता”। प्रशान्त बाबू ने तुरंत अपना कलाम निकाला और अपनी हथेली पर पता नोट कर लिया। पता था,आनंदश्री,धनिया टोली,शिवपुर “। सुबह के 3 बज रहे थे और प्रशान्त बाबू थक भी गये थे इसलिए उन्होंने सवेरे उस पते पर जाने का निश्चय किया और पास में एक मादिरे के प्रांगण में  बैठ कर सो गए।  

          कुछ ही देर में सुबह हो गयी,शमशान में थोड़ी हलचल भी बढ़ गयी थी। रविवार का दिन था। सूरज की रौशनी धीरे-धीरे बढ़ने लगी तभी वहाँ किसी मृत के परिजनों के रोने की आवाज से प्रशांत बाबू उठ गये। आँख खुली तो सामने किसी का दाह संस्कार हो रहा था,उसे देखते ही उनके सामने भिखारी का चेहरा आ गया ,प्रशान्त बाबू ने मुड़ कर देखा तो भिखारी का शरीर ख़ाक हो चूका था,और अग्नि देने वाले कर्मी ने उन्हें अस्थियां बटोर कर उनकी तरफ आ रहा था और उनके पास आ कर बोला,” क्या हालत है आजकल के रिश्तों का,अस्थियां भी अब हम ही बटोरेंगे क्या,भाई साहब याद रखो की ये वही इंसान की अस्थियाँ हैं जिसने तुम्हारे बचपन में तुम्हारी गंदगी साफ की हैं और आज तुम अस्थियां चुन ने से कतरा रहे हो,ये लो पकड़ो ये अस्थियां ,मैंने चुन कर इस मिट्टि के बर्तन में रख दीं हैं “। प्रशान्त बाबू ने अस्थियां मंदिर में एक किनारे रख दीं ,वैसे भी लाल कपडे से बंधे मिट्टी के बर्तन जिसमे अस्थियां हो उसे कोई छूता तक नहीं है। जीते जी तो कोई किसी की मदद नहीं करता मरने के बाद कोई क्या करेगा। प्रशांत बाबू ने जल्दी से जा कर प्रशाशन द्वारा बनाये गए स्नान घर में अपना हाथ मुंह धोया।वे अपना हाथ धो रहे थे की उन्हें अपनी हथेली पे लिखा पता दिख गया।उन्होंने सोंच की उस पते पर शायद भिखारी को जानने वाला कोई मिल जाये।वे तुरंत अपना काम समाप्त कर उस पते की और चल पड़े। शमशान से बहार निकलने पर कुछ रिक्शा वाले खड़े मिले,प्रशान्त बाबू ने उनमे से एक को बुलाया और हथेली पे लिखा पता बताया। रिक्शा वाले अपने हाथ के  ईशारे से उन्हें दिशा दिखाई,प्रशान्त बाबू नु उस से पुछा,” कितना भाड़ा लोगे? रिक्शा वाले ने कहा,”30 रुपये लगेंगे”। प्रशान्त बाबू ने हाथ से चलने का इशारा किया और रिक्शा पर बैठ गए।रिक्शा वाले ने भी अपनी लुंगी में से खैनी की डिबिया निकाली और खैनी बना कर ताल ठोकने के बाद खैनी को अपने होठ के नीचे दब लिया और रिकशा धीमी गति से चल पड़ा। अगल- बगल  से मोटर गाड़ियां भी निकलती जा रहीं थीं। रिक्शा वाला अनोखी मुद्रा में रिक्शा चला रहा था।वह पहले से ही अपनी सीट पर थोड़ा टेढ़ा बैठा था और कभी बायीं ओर उठता तो कभी दायीं ओर। नारंगी रंग की बनियान और नीली लुंगी जिसमे कुछ छेद हो चले थे उसने पहन रखी थी। प्रशांत बाबू ने उस से पूछा,” अरे तुम सीधा क्यों नहीं बैठ रहे हो?टेढ़ा बैठोगे तो कैसे रिक्शा चलाओगे?। रिक्शा वाले ने जवाब दिया,” कहाँ टेढ़ा बैठे हैं,हमरा गाडी का अगला भाग टेढ़ा है ही तो क्या करे”। प्रशान्त बाबू ने ध्यान से देखा तो उसकी सीट बायीं ओर मुड़ी हुई थी और आगे का पहिया और हैंडल दायीं ओर मुड़ी थी, इस विचित्र मुद्रा में वह अपनी दाएं कंधे तो थोड़ा ऊपर की ओर उठा कर रिक्शा चला रहा था। देखते ही देखते समय बीत गया और प्रशांत बाबू पते पर पहुँच गये। रिकशे वाले को उन्होंने 30 रुपये दिए और चलता किया। सामने लिखा था आनंदश्री,प्रशान्त बाबू ने उसे घूर कर देखा,बड़ा ही सुन्दर छोटा सा घर था वो।फूल-पत्तियों से भरा पूरा,छोटे से आंगन में कलरव करते पक्षी,गेट पर गिरे हुए मधुमालती के फूल और उसे साफ़ करती हुई एक बाई।प्रशान्त बाबू ने उस बाई से पूछा की ये सुन्दर सा छोटा घर किसका है,तो उसने इशारा करते हुए घर की बाहरी दिवार पर लिखे हुए नाम को दिखाया। ” अवनीश गुप्ता,प्रधानाचार्य शाश्कीय विद्यालय नीमगंज सेवानिवृत्त”। यह पढ़ते ही प्रशान्त बाबू के मन में एक छवि सी आयी,थोड़ा ध्यान लगाने पर वह छवि साफ़ हो गयी जो की उनके बचपन के स्कूल के प्रधानाचार्य की थी,लेकिन तब भी वे अपने प्रधानाचार्य से भिखारी का सम्बन्ध नहीं समझ पाए।उन्होंने उस बाई से कुछ सवाल करने की कोशिश की पर वह मुंह मोड़ कर अंदर चली गयी। सड़क के उस पार एक पान की दूकान थी वहां से एक आदमी पान खा कर आनंदश्री के अंदर चला गया। प्रशान्त बाबू ने जा कर पान की दुकान पर पूछा,” भाई,ये जो अभी-अभी पान खा कर सामने के घर में गया है वो कौन है? पान वाले ने पहले पान की एक पिचकारी निकाली और बोला,” नया किरायेदार है साहब”। प्रशान्त बाबू बोले,” तो इसके असली मालिक किधर हैं? दुकान वाले ने उनकी ओर देखते हुए कहा,”लगता है कि आप इस मोहल्ले में नए हैं ,आपको नहीं पता क्या,की इसके मालिक तो प्रिंसिपल साहब थे,उनका बेटा और उसका परिवार रहते थे यहां,लेकिन एक दिन प्रिंसिपल साहब के साथ सड़क हादसा हो गया,सर पे चोट लगी,और एक पैर भी ख़राब हो गया,उनके इलाज के लिए बेटे ने अपने पिता को अस्पताल में भर्ती किया लेकिन आचानक एक दिन इस घर को बेच कर कहीं चला गया।तब से न तो उसका पता है और न ही प्रिंसिपल साहब का,बस कुछ बचा है तो उनका दिवार पर लिखा हुआ नाम। बहुत प्रेम से प्रिंसिपल साहब और उनकी मालकिन ने इस घर को बनाया था। पुरे मोहल्ले में कहीं फूल हों या न हों इनके घर में जरूर होते थे।सुख समृद्धि और शांति बस्ती थी यहाँ पर फिर एक दिन मालकिन को ऊपरवाले ने बुला लिया,और प्रिंसिपल साहब अकेले रह गए।वहीँ से इस घर की और प्रिंसिपल साहब की दुर्गति शुरू हो गयी। लेकिन आप क्यों पूछ रहे है ये सब?आप हैं कौन साहब?” प्रशान्त बाबू चुप हो गए,वह उस समोसे वाले हलवाई की कही गयी बातों को इस पान वाले की बातों से जोड़ कर सोंचने लगे, प्रशान्त बाबू घर को देख रहे थे और मन ही मन उस भिखारी के हँस कर अपने सिर को हिलाते हुए दृश्य को भी याद कर रहे थे।उन्हें पूरी कहानी समझ आ गयी थी। पान वाले को मुस्कुरा कर उन्होंने कहा,” भाई मैं एक समाज सेवक हूँ और प्रिंसिपल साहब का शिष्य हूँ,उन्ही की सिखायी गयी चीज़ें मेरी प्रेरणा का श्रोत हैं,चलता हूँ”। प्रशान्त बाबू शमशान गये और उस भिखारी की अस्थियों का एक पंडित के अनुसार विधिवत प्रवाह किया। प्रवाह करते वक़्त स्कूल की घंटी के बजने की आवाज़ आ रही थी। प्रशान्त बाबू को उनके बचपन की पाठशाला याद आ गयी और साथ ही साथ अपने प्रधानाचार्य की भी। अपने गुरु को याद करते हुए उन्होंने उस भिखारी यानि प्रधानाचार्य को प्रणाम किया और भगवान् से उनके आत्मा की शांति के लिए प्राथना भी की। प्रशान्त बाबू   निश्यच किया कि ऐसे कई बेनाम लोग रोज़ ही मर जाते हैं जिनका उनके अंतिम क्षणों में भी कोई कल्याण नहीं करना चाहता इसलिए वे शनिवार और रविवार को शमशान घाट आ कर लावारिस लाशों का दाह संस्कार करेंगे। वे कुछ देर तक नदी के बीच नाव पर बैठ कर स्कूल के बच्चों के खेलने की आवाज़ को सुनते रहे और मुस्कुरा कर आसमान की ओर देखने लगे।                                                                                                                                   -शिशिर

​हैप्पी न्यू इयर

2016 का पहला दिन है आज। सभी कोई ख़ुशी मना रहे हैं। रात भर दिल्ली की गलियों में हुड़दंग मचती रही है।पुलिस की वैन और मोटरसाइकिलें रात भर गश्त लगाती रही हैं और अपनी ड्यूटी निभातीं रहिं है। सुबह हो गयी है और मोहल्ले से आवाज़ आ रही है…जानी पहचानी सी आवाज़ है ये तो। काफी दिन हो गए इस आवाज़ को सुने हुए। ओ…भैया…ओ बहन…कुछ गर्म कपड़े हैं तो दे दो…ओ…माई…।जनवरी का महीना है और ठण्ड भी अपने चरम पे है,मैं यह सोच ही रहा था की मेरे मन में एक छवि आई,अरे ये तो वही बूढी अम्मा है जो कुछ महीने पहले आई थी। बूढी अम्मा की छवि धीरे धीरे साफ़ होने लगी। मेरे पास एक पुरना कम्बल पड़ा था। मैंने सोचा की इसका कोई उपयोग तो है नहीं मुझको, तो फिर क्यों न मै इस कम्बल को अम्मा को दे दूँ। मैं सीढ़ी से उतर कर नीचे गया और बूढी अम्मा को मैंने कम्बल दे दिया। अम्मा के चेहरे पे और भी झुर्रियां आ चुकी थी, मैली सी हरे रंग की साड़ी में एक हाथ से लाठी पकडे हुए वो धुंद के बीच गली में घूम रही थी। एक पीले रंग का स्वेटर पहन रखा था उसने जो कहीं कहीं फ़ट चूका था और पीले रंग से कुछ भूरा रंग का हो चूका था। ललाट पे अम्मा के जो झुर्रियां थीं उन पर भी झुर्रियां आ चुकी थीं,जिस से उसकी कष्टदायक ज़िन्दगी का पता चल रहा था। आँखें में मैल था,और कुछ कुछ हल्का हल्का पानी भी छलक रहा था। उसने मुझे देखा और धीरे धीरे ठक ठक की अवाज़ करती हुई मेरे पास आई और कम्बल को ले लिया। अम्मा ने कम्बल को टटोल मटोल कर देखा और मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा, पीछे घूम कर वो फिर से अव्वाज़ निकलने लगी ओ…भैया…. ओ बहन….कुछ गर्म कपडे हैं तो दे दो…ओ ..माई…। फिर वो घने कोहरे में आवाज़ लगते हुए गायब हो गयी,बस उसकी लाठी की ठक ठक की आवाज़ सुनाई दे रही थी।…..

खजूर मीठे हैं….




सवेरे की गयी गायें-भैंसें जंगल से घास चर कर वापिस लौट चुकी थीं।लौटते वक़्त उनके खुरों से कच्ची सड़क पर की गयी चोट से जो धुल उडी थी वो हवा में अभी तक तैर रही थी,और जा कर पीपल के पेड़ के पत्तो पर बैठ सी जा रही थी जिसके चलते गहरे हरे पत्तों का रंग हल्का हो चला था।उन पत्त्तों से छन कर जो सुनहरे सूरज की रौशनी आ रही थी उसमे धुल के कण हवा में अनायास ही तैर रहे थे।गायों की  रंभाने की आवाज़ और उनके गले पर घंटियों की  टन-टन की आवाज़ धूल के साथ हवा में तैर रही थी। गौरैयों के झुण्ड जोर-ज़ोर से चहचहाते हुए ज़मीन पर पड़ी धूल में घुस-घुस कर नहा रही थे और उनके पास ही मैना सुबह के निकले कीट-पतंगों की दावत उड़ा रही थी। आसमान में सारस पक्षी कोण के आकार में अपने बड़े-बड़े पंखों को ऊपर- नीचे की मुद्रा में करते हुए हवा में उड़ रहे थे।दूर खेत में कृत्रिम पंप के चलने की आवाज आ रही थी। गांव में बहुत सारे खजूर के पेड़ थे जिनपे रसीले खजूर लगे हुए थे। चन्दु खजूर के पेड़ पर चढ़ा खजूर तोड़ रहा था और उसका साथी नीचे खड़ा ऊपर से गिरते हुए रसीले खजूरों को या तो हवा में ही पकड़ ले रहा था या जमीन पे गिरे हुए खजूरों को आस-पास के घुमते सूअरों के झुण्ड से बचाते हुए जमा करते जा रहा था।”लगत है कि इ बार बड़ी मीठा-मीठा है,जेतना जमीनवा पे गिरल है सब के चुन ले नीचे से,एक्को गो सुअरवा सब के मुंह न लगे पारे,बड़ी मेहनत से एतना ऊपर चहड़े हैं, मार सुअरन के,उ देख हुवां कैसे झुंड में बाल- बच्चा के ले कुक्कुर नियर खेजूर खाये खातिर घूरत है,देख रे रबिया,सब खेजूर के हम हियाँ उपरे खाई लेब,एक्को गो न देबे हम खाये खातिर केकरो के,मार ढेला भगा सब सुअरन के,हठ….”। रवि जो चन्दु का दोस्त था वो पेड़ के नीचे जल्दी-जल्दी जो भी खजूर ऊपर से गिरता उसे अपने गमछे में रख लेता,” तू तो चुपचापे रह,कौन दिन तोरा साथ नहीं दिए हम फल-सब्जी चोराने में,जौन पेड़ पर चहड़ गये,ऊ गाछ का पूरा फल खली हम दुन्नो का,अब जल्दी नीचे आ,पूरा एक गमछा खेजूर जमा है,जल्दी आ,बइठ के खूब खाएंगे,हे…हे…हे…”। चन्दु,” 2 मिनिट दे हमका,एक पलक का झपकी में हम नीचे आवत हैं,ऐ…ऐ…..अगे मैया गे….हाँ… ई ले हम नीचे औ गाछ का पूरा खेजूर तोहार गमछा में,चल रे, बड़ी  भूख लगल है,कुछो न खाये हैं,ला रे खेजूर ला”। दोनों दोस्त मिल कर खजूर की दावत उड़ा रहे थे और आपस में बातें भी कर रहे थे,”ऐ, चन्दु,खेजूर खूब्बे मीठा है रे, एकदम चीनी जैसा,मजा आ गिया रे”। चन्दु ने बोला,”मीठ तो है, पर,तू कैसे जानत है कि चीनी जैसन मीठा है,कभियो चीनी देखा है? बड़का नई तो,झूठठा,पेट में आग लगल है हियाँ औ तोरा के झूठ-झूठ बात सूझत है”। रवि ने कहा,” तू कौन सा चीनी देखे है रे, हांके खातिर हम ही मिले का रे तोरा,तू हो तो कभी नहीं देखे है चीनी”। चन्दु बोला,”देख नहीं तो ,सुन तो सकत हैं हम”। रवि बोला,” का सुना रे? हमनी के हो बता थोड़ा”। चन्दु ने कहा,” अरे चीनी रे, औ का,ओहि सुने हैं,सुने हैं कि कांच जैसन होवत है,एकदम मेही-मेही दाना जईसन,हम हूं देखे नहीं है कभियो तोरे जईसन हे…हे…हे,पता नहीं की खावे में कैसा लागे है चीनिया,ई का!!बढ़िया आएं,बड़ी तेज न? हमरा दिमाग चीनी में फंसा के खूब अकेले-अकेले खेजूर लील लेले बेटा तु तो,ला इधर एक्को गो नाइ देबे हम,अरे बाप रे ई का है…ई गमछा!!!अरे ई भी हमरे है,हमनी से सब चोरी के तरीका सीख-जान के हमनी से ही चोरी करबे तू, ला दे,हठ हियाँ से,चोट्टा…”। रवि ने हँसते हुए कहा,” हे..हे… अरे ईआर ….सब तो तोहरे है ईआर..तोहरे मेहनत के खेजूर है..हे… हे….हे”। चन्दु ने पूरा गमछा छीन लिया,कुछ खेजूर खाये और बाकी बाँध कर अपने   पास रख लिए।

              सूरज आस्मान में कुछ ऊपर जा चूका था।कृत्रिम पंप की आवाज हवा की दिशा बदलने के चलते इधर-उधर से आ रही थी। दूर खेतों में एक पतली सी लकीर की तरह लंबे-लंबे पर लचीले बांस तन कर खड़े दिख रहे थे,उनमे से कुछ का आसमान को चूमता छोर बार-बार, रह-रह कर जमीन की ओर झुकता था,शायद दूर कोई कुआँ था जिस से गांव के लोग बांस के एक छोर पे रस्सी बाँध कर पानी निकाल रहे थे।उनके ठीक ऊपर सूरज जगमगा रहा था और उन्हें देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि वे बार-बार सूरज को सलामी ठोक रहे हों। इधर चन्दु नीम की छाँव में अपने दोनों हाथों को सर के पीछे लगा कर जमीन पे आँखे मूँद,नारंगी रंग की जांघिया पहने दाहिने पैर की एड़ी को अपने बाएं पैर के घुटने पर टिका कर लेटा हुआ था। रवि भूसे के तिनके को अपनी दांतों में दबाये हुए,एक लंगोट पहने पालथी मार कर बैठा हुआ था,तभी उसने पूछा,” घर में का बनाये है माई आज?” चन्दु ने कहा,” का पता पकल आलू होगा”। रवि बोला,” छिह, आलू एकदम बे-सवाद होत है,हमका नाही पसंद,कम से कम नमक तो देबे के जरूरी है ओकर में”। चन्दु बोला,” अच्छा, तोर हियाँ का बनल होगा अभी?” रवी एक नुकीले से पत्थर को ले,जमीन पर उसकी नोक से घिसते हुए कहा,”ओहि..आलू… अउ का,23 बरस से अलुईये तो खईये रहे हैं।अब मन नहीं लगत है आलू खाने में”। चन्दु ने पुछा,”ई अचानक नबाबी केन्ने से आ गिया तोरा में,साला आपन मुँह देखा है कभी नदी का पानी में,साला करिया जरल अलुओ भी बढ़िया दीसत है तोरा चेचक बला मुंह से।आलूऐ सब कुछ है समझा।ओहि खाना है पूरा जिंदगी।” रवि थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला,” हम जो चीज खईले रहे न ऊ तो तोरा के सातो जनम में न मिलबे हाँ…।” चन्दु ने पुछा,” कोनो सर पे चोट-उट तो न लगले तोरा के रे? कहीं पिछले जन्म के कौनो बात अभी तो नाही याद आवत है।”रवि बोला,” धुत तोरा के,अरे पिछले जनम के नहीं एही जनम के बात है”। चन्दु ने मजाक में बोला,”ना हम सोचली की पिछले जनम में कौनो अमीर इंसान के घर कुत्ता-उत्ता होबे तू,तो ओहि बात आभी याद आ गइले, काहे की,पिछले जनम में आदमी में पैईदा लेने के तो न कोई चानस है औ न तोर औकात है”।रवि ने गुस्से में चन्दु की ओर मुठ्ठी भर मिट्टी फेकते हुए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की।रवि बोला,” हट साला,कभियो तो अच्छा बात न बोल सके है तू,पर ई जान ले हम सच बोलत हैं,का सूआद रहले रहे ऊ मुर्गी अउ भात के,आहा… खाली सोच्चे के मुँह में पानी-पानी हो जात है।”चन्दु ने जिज्ञासा से पूछा,” कब का बात है रे, हमका नाही बोल ले तू अभी तक!” रवि ने हस्ते हुए अपना सर हिलाते हुए कहा,” ह्म्म्म… जे सुआद रहले ऊ दावत के,भगवान् करे उ बुढआ के आत्मा के सांती मिले(हाथ जोड़ते हुए)“। चन्दु ने पूछा,” को बूढ़ा रे?” रवि बोला,” अरे , उ जो चौधरी के घरे थे ना बड़का चौधरी,ओकर मरे में मुर्गी बने रहे,ओहि खइले रहे हम,का सुआद….का…सुआद रहले रहे ओकर,बाह”।चन्दु ने अपना सर पीटा और एक- दो कंकर उठा कर रवि को दे मारा,”मर साला,मर चोट्टा,साला उ मुर्गी खईले रहे उ दिन तू? साला, हुआं हम भी गेल रहली रे,उ जो तू खइले रहले न उ मुर्गी समझ के उ मुर्गी-उर्गी न अलुइये के सब्जी अउ मोटका दाना बला भात रहले रे चोट्टा, अरे ई मुर्गीमानव कहा से भेटा गइले रे दद्दा,मरला पर कोई मुर्गी खिलावे है का रे गधा? रवि बोल रहा था,” अरे का बोलत है तू? झूठ मत बोल भरल दुपहरिया में,ई ठीक बात नइखे”। तब तक 2-4 कंकर और मारे चन्दु ने रवि को।रवि ने कहा,”अच्छा ठीक है तू जीत गेले अब ठीक,ला दू-तीन ठो खेजूर दे तो,भूख लगत है”। चन्दु ने कुछ खजूर निकाल कर दे दिए और पुछा,” तोर नाम के मतलब तोरा के पता है?” रवि ने सर हिलाते हुए ना का इशारा किया।चन्दु बोला,”तू मानुस है कि बान्दर है रे, रबी माने होवत है सूरज भगवान्,नाम तो तोर एकदम चकाचक है,लेकिन दिमाग और करम से तू तो सैतान से भी आगे है”। रवि ने कहा,” तू का बड़का आदमी है,जो अइसन बात करत हैं हमसे?” चन्दु ने कहा,” हाँ हम बड़का आदमी हैं,हमरा कई ठो लोगन से जान पहचान है”। रवि ने पूछा,”जईसे कोन लोग?” चन्दु बोला,” जईसे की…बस के डलेभर साहेब,और खलासी,उ दोकान के मालिक,सब कोई हमका चिन्हे हैं”। रवि ने हस्ते हुए कहा,”हाँ,कहे नहीं चिनबे तोरा के,रोज जे 1 रुपिया,2 रुपिया खातिर उनकर आगे भीख जो मांगे है तू,हे…हे…हे..”।चंदू भी रवि की ओर देखते हुए हँस पड़ा,’हे..हे…हे,अब का करी हम ।                                                           तभी बगल के रास्ते से एक शव यात्रा जा रही थी,राम का नाम लेते हुए सब अपना सिर झुकाए चलते जा रहे थे। गांव के कुछ लोग भी उनके साथ मिल कर शमशान की ओर जा रहे थे। रवि और चन्दु भी खड़े हो गए,दोनों का एक हाथ मुह में था और दोनों खजूर खा रहे थे।दोनों कोई ये देख रहे थे की गांव के कुछ लोग शव यात्रा में शामिल हो रहे थे।दोनों ने एक दूसरे की और देखा और खजूर फेंक कर चुपके से दोनों भी उस यात्रा में घुस गए,और राम नाम जपने लगे। वो जानते थे की दाह संस्कार बाद जब सब कोई वापिस लौटेंगे तो मृत के परिवार वाले यात्रा में शामिल होने वालों को मिठाई देंगे।रवि आँख भीचते हुए और हलकी मुस्कराहट के साथ चन्दु के हाथ को दबा रहा था,उसकी खुशी रुक नही रही थी,चन्दु ने झटके से उसका हाथ हटाया और रोने का नाटक करने लगा,उसे देख रवि भी रोने की कोशिश करने लगा।शाम हो गई सब कोई दुखी थे सिवाए इन दोनों के,जैसे ही मुर्दे को अग्नि के हवाले किया गया,मृतक के परिवार वाले रोने लगे,उन्हें देख कर रवि और चन्दु भी दहाड़ मार कर रोने लगे,” बाबूजी,हाय… हाय, हमको अकेला छोड़ के चले गए,अब कौन बैठेगा आपका कुर्सी पे,हाय- हाय, ई का कर दिए भगवान् रे, अच्छा नहीं किये तुम रे भगवान् रे, चन्दु जमीन पर बैठ गया और अपना सर पीट-पीट कर    जोर-जोर से अगे मैय्या गे…. अगे मैय्या गे बोल कर रोने का नाटक करने लगा।उसे देख इस लालच में की चन्दु को ज्यादा मिठाई न मिल जाये,रवि जमीन पर लेट गया,और सर के बालों को नोचते हुएचिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा,” पिताजी…बापू…. हमको बी मार दो रे…. हाय पिताजी…..हाय…”।रवि उत्तेजना में धूल-मिट्टी अपने ऊपर मलने लगा,उसे देख चंदू चुप हो गया,और मृतक के परिवार वाले भी चुप होकर रवि को देखने लगे।  चन्दु ने थोड़े भारी स्वर में कहा,” बस-बस ,अरे बस कर राविया,सब हमनी के देखत है”, चन्दु रवि को पकड़ कर चुप कराने की कोशिश करने लगा,और बोलेने लगा,”न रो र् बचवा,बाबूजी ऊपर खुस हैं,ऊपर से हमनी सब के देखत हैं और आशीर्वाद देत हैं बाबु, मत रो रे मत रो”। रवि भी अचानक चुप हो गया, सब कोई शांत थे,वहां पर बस चिता की लपटों की आवाज आ रही थी। परिवार के मुखिया ने अपने आँसु पोछते हुए  गुस्से में कहा,”कौन हैं ये लोग,उठा कर बहार करो इन्हें,क्या नाटक चल रहा है क्या यहाँ पर? मेरी माँ का देहांत हुआ है ,पिताजी अभी जीवित हैं यह देखो(उसके पिताजी व्हीलचेयर पर बैठे हुए थे),मारो इनको ,मुझे अनाथ बनाने के लिए आये हैं” कुछ लोग आए और दोनों को उठा कर मारते हुए शमशान के बहार ले गए,और जम कर उनकी पिटाई की।रात हो चली थी,दोनों कोई एक किनारे चुप-चाप बैठे थे,चन्दु अपने सर पे हाथ रख बैठा हुआ था,और रवि बोल रहा था,” बड़ी मार मारे हैं सब मिल के,मीठा खाने गए थे,कुकर्मी सब से मार खा लिए रे, पीठ में कोहनी से बडी गदा-गद मारा है सब,बहुते दरद होवत है,अब नहाने धोने का कोनो जरूरी नहीं है,जेतना धुल मले थे सब उड़ाया दिया मार-मार के।ऐ चन्दु तू का सोचत है रे, ला तो दू-तीन गो खेजूरे दे तो,बड़ी मीठा खेजूर है”। चन्दु ने पूरा गमछा ही उठा कर रवि को दे दिया और कहा,”ले खायी ले मीठा खेजूर,एकदम मिठाई नियर है,हाँ,खा ले चोट्टा….।

नीम और बन्दर

एक गांव की सड़क के किनारे एक हराभरा नीम का पेड़ था। सूरज निकल हुआ था गांव में चहल पहल बढ़ चुकी थी। हवा भी उस दिन कुछ वेग से बह रही थी। नीम की टहनियों पे बहुत सारे कबूतर,गिलहरियां और गौरैयों ने अपना बसेरा बनाया था। पेड़ के पास एक चाय की दूकान थी जहाँ पर लोग बैठ कर चाय पी रहे थे और कुछ लोग अखबार भी पढ़ रहे थे। पेड़ भी उनकी बाते सुन रहा था।एक आदमी ने चाय की चुस्की ली और अखबार का पहला पन्ना पढ़ना शुरू किया ही था की उसने चाय की कुल्हड़ को वापिस मेज़ पे रख दिया और बोला क्या वक़्त आ गया है,जहाँ देखो वहाँ लोग एक दूसरे के जान के दुश्मन बने बैठे है,इंसानियत नाम की चीज़ रही ही नहीं आज के वक़्त में। तभी वहाँ बैठे एक आदमी ने पुछा क्या हुआ भाई ऐसी बाते क्यों कर रहे हो। उस आदमी ने बोला ये देखो भाई अखबार के पहले पन्ने पे खबर छपी है की  एक आदमी ने शहर में 20 रूपियो के लिए एक रिक्शेवाले की जान ले ली। हद हो गई। यह सुन कर पेड़ सोच में पड़ गया की ऐसी क्या बात हो गयी की एक आदमी ने दूसरे आदमी की जान ही ले ली। तभी पेड़ की तने पे एक अजगर ऊपर की ओर कबूतर के शिकार के लिए चढ़ रहा था । धीरे धीरे अजगर कबूतर के पास आ गया और बेचारे कबूतर को जब तक पता चला की वो अजगर का निवाला बन ने वाला है तब तक अजगर ने उसे अपनी कुंडली के जकड में दबोच लिया। कबूतर ने धीरे से पूछा की अजगर महाराज आप मुझ जाने दें। अजगर बोला तू मेरा खाना है और मैं भूखा हूँ,कई दिनों से मैंने कुछ नहीं खाया है,तुझे मैं नहीं छोड़ सकता। अजगर ने धीरे धीरे अपनी कुंडली को कसना शुरू किया और चंद पलो में कबूतर की जान निकल गयी। फिर देखते ही देखते अजगर ने कबूतर को निगल लिया। ये पूरा वाक़या नीम का पेड़ देख रहा था।अजगर जा कर नीम की ऊपर ली टहनी में लिपट गया और आराम करने लगा। थोड़ी देर बाद एक बाज़ उड़ कर आया और उसने अजगर को अपने पंजो में पकड़ लिया और उड़ गया। वो बाज़ हवा में तैरता हुआ नीम की एक टहनी पे मरे हुए अजगर को ले कर बैठ गया और उसे नोच नोच कर खाने लगा। नीम ने हिचकिचाते हुए पूछा अरे बाज़ तुमने इस अजगर को क्यों मारा,ये तो बेचारा ऊपर मेरे टहनी पे सो रहा था। बाज़ ने कहा मुझे भूख़ लगी थी इसलिए मैंने इसे मार डाला। पेड़ को अब कुछ बात समझ आई ,की जब किसी को भूख लगती है तब वह किसी दूसरे को मार कर अपनी भूख मिटाता है।बाज़ अजगर को खा कर उड़ने ही वाला था की एक धमाके की आवाज़ हुई और बाज़ ज़मीन पे आ गिरा। एक आदमी आया और मरे हुए बाज़ को उठाया और बोला अब इस बाज़ को मैं अपने घर पे सजाऊंगा। उस आदमी ने अपनी बंदूक की गोली से बाज़ को मार डाला था। फिर वो आदमी वहां से चला गया। पेड़ दुखी हो गया।और सोचने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था की जब उस आदमी को भूख नहीं लगी थी तब उसने बाज़ को क्यों मारा। तभी एक एक बूढा बन्दर  नीम की एक मोटी सी टहनी पे आ कर बैठा। पेड़ ने सोचा की ये बन्दर अनुभवी लगता है मैं इस से पूछता हूँ। नीम ने धीमे ऐ पूछा भाई वानर महाराज एक सवाल पूछूँ ? बन्दर बोला पूछो भाई। नीम बोला महाराज इंसान को जब अपनी भूख़ मिटाने की ज़रुरत नहीं होती तब भी वो दूसरों की हत्या क्यों करता है? बन्दर बोला अरे ये कैसा सवाल है!नीम ने कहा आप अनुभावी है इसलये मेरी जिज्ञासा हुई ये सवाल करने की।बन्दर बोला मै अनुभवी लगता हूँ ?वाह!! चलो इस बात पे मैं तुम्हारी जिज्ञासा दूर कर देता हूँ,देखो,इस दुनीया में सारे जीव किसी का शिकार तभी करते हैं जब उन्हें अपने परिवार या अपने भोजन की व्यवस्था करनी होती है,जैसे शेर  शिकार करता है अपना पेट भरने के लिए,घड़ियाल भी किसी की हत्या करता जब उसे खाने की इक्छा होती है।संसार में कोई जीव किसी का दुश्मन नहीं है,कोई भी जीव कीसी दूसरे की हत्या दुश्मनी निकलने के लीए नहीं करता सिवाए आदमियों के। आदमी ही एक अकेला जीव है जो या तो अपना गुस्सा उतरने के लिए या फिर लालच के मारे या फिर दिखावे के लिए किसी की जान लेता है। इंसानो को सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करना होता है और कुछ नहीं। इसकी आपूर्ति के लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है,वो अपने और अपनी जाती को भी धोखा दे सकता है,उनकी जान भी ले सकता है। नीम दुखी हो गया। बूढा बन्दर बोला अरे अरे तुमने क्यों अपना मुह लटका लिया,तुम्हे तो इंसानो पर ठहाके लगा कर हंसना चाहिए मेरी तरह हा हा हा हा हा…खुश रहो की तुम इंसान नहीं हो….बन्दर फिर हँसता हुआ वहां से चला गया।