बादल

नील गगन में कहाँ जाते हो तुम,सफेद छरहरे रुई के टुकड़ों जैसे नीले पट पर किधर से आते हो तुम,पल-पल झोंको के हवा से रूप बदलता तुम्हारा,धीरे-धीरे रुक-रुक बढ़ता आकार तुम्हारा,एक के पीछे एक किसे ढूंढने आते हो तुम

धागों से बंधे अर्श पर,सूरज की सुनहरी किरणों पर;चुपचाप निरंतर आखिर किसका पीछा करते हो तुम,बिना किसी रूप बस हवा के अनुरूप ढल जाते हो खग देख तुम्हे बोल उठते;पेड़ों के पल्लव खिलने लगते,अंदर अपने नीर समेट क्या कर्तव्य निभाते हो तुम,

कभी गतिशील तो कभी धीमे,कौन जाने किधर बरसने को जाते हो,बताओ किसीकी बुलाहट पर आते हो तुम,

बादल क्यों कहलाते हो तुम?

–शिशिर पाठक

Advertisements

पिट्टो

आज एक अजीब सी बात हुई
ठंड का मौसम था
शाम हो रही थी,भीड़ में सभी कारों की और
मोटरसाइकिलों की बत्तियां जल रही थी
कुछ धुंद भी छा रही थी,धीमे धीमे से ठण्डी हवा भी बह रही थी
भीड़ के बिच रेल फाटक पर मैं
रेलगाडी आने का इंतज़ार कर रहा था
पास ही एक मैदान था
कुछ बच्चे वहाँ लाइट पोस्ट की नारंगी रौशनी के नीचे खेल रहे थे
एक बच्चे के हाथ में कुछ
गेंद सी दिखाई पड़ी, ध्यान से देखा तो घिसी-पिटी सी
धूल में सनी प्लास्टिक की “सफ़ेद” गेंद थी
गेंद वाला वो बच्चा भी देखा- देखा सा प्रतीत हो रहा था
वो छोटे बड़े पत्थरो को जमा कर एक के ऊपर एक रख रहा था
बाकी बच्चे उसके आस पास इकठ्ठा हो गए थे
उसने ज़ोर से गेंद को उन जमा किये पत्थरो पर दे मारा,और भागने लगा,
गेंद मैदान में दूर कहीँ चली गयी,अँधेरा हो चला था
बाकी के बच्चे गेंद को मैदान में इधर उधर ढूँढने लगे
वो बच्चा जल्दी -जल्दी फिर से पत्थरो को ठीक उसी तरह जमा करने लगा जैसे की उसने पहले किया था
अब तो खेल भी जाना हुआ लगने लगा था मुझे
तभी किसी बच्चे को गेंद मिल गयी, उसने गेंद ज़ोर से पत्थरो की ओर फेकी
जो छिटक कर अचानक मेरी ओर हवा में तेज़ि से बहती हुई आने लगी,आँखे ज़ोर से बंद कर मैंने
अपने चेहरे को बचने के लिए अपना “दाहिना” हाथ उठाया,लेकिन जब आँखेँ खोली मैंने
तब न तो बच्चे थे,न ही कोई पत्थर और न ही वह “सफ़ेद” गेंद…प्लास्टिक की..
बस रेलगाड़ी की ज़ोर से हॉर्न बजाते हुए फाटक को पार करने की अववाज़ थी
और उसके पहियो की आवाज़ पटरियों से निकल कर भीड़ में मिल सी जा रही थी

पिट्टो खेल रहे थे बच्चे……..पिट्टो..,
गुज़रे हुए कल में……..नाम तो सूना ही होगा आपने “पिट्टो” का
या फिर “शयाद” खेल भी होगा….क्यों ठीक “ही”कहा ना मैंने???…..

–शिशिर पाठक

पागल कौन?

अनिल एक विद्यार्थी था जिसके होस्टल के कमरे के पास ही एक जिलेबी की दुकान थी जहाँ वो और उसके दोस्त रोज़ शाम को पहुंच जाते थे।आज भी अनिल और उसके कुछ दोस्त रोज़ की तरह अपनी मनपसंद जिलेबी की दुकान पर जा रहे थे। वैसे तो हर रोज़ वे उस पगली भिखारन की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे लेकिन आज बात कुछ और थी। रास्ते में चलते हुए उन्हें कहीं से कराहने की आवाज़ आ रही थी। अनिल और उसके दोस्तों ने जा कर देखा तो पगली भिखारन प्रसव पीड़ा में अर्धमूर्छित अवस्था में थी। दोस्तों ने आपस में कहा,” अरे ये तो वही भिखारन है जो रोज़ यहाँ पड़ी रहती है। ये गर्भ से कब और कैसे हो गयी?” अनिल और दोस्तों को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। सारे लड़के दिल के अच्छे थे और चाहते थे कि भिखारन का कष्ट किसी तरह कम हो जाये। उन्होंने राह चलती कुछ महिलाओं से रुक कर भिखारन की सहायता करने का अनुरोध किया लेकिन किसी न सुना। फिर फोन लगा कर अपने साथ पढ़ रही छात्राओं को हालात की गंभीरता समझते हुए बुलाने की कोशिश की,जिन्होंने हाँ तो कह दिया पर मौके पर उपस्थित नहीं हुईं। अनिल ने लोकल स्वास्थ्य केंद्र का नम्बर घुमाया लेकिन किसी ने फोन का उत्तर नहीं दिया।आखिर में जब दोस्तों से रहा नहीं गया तो सब ने हिम्मत बांध कर भिखारन और उसके बच्चे को खुद ही बचाने का निर्णय लिया। कुछ देर की मशक्क़त के बाद बच्चे की रोने की आवाज़ आयी। बच्चा सुरक्षित था और माँ की सांस तो चल रही थी पर मूर्छित थी।उस नवजात को उठाये वह और उसके दोस्त सोंच में पड़ गए कि आखिर इंसानियत इतनी गन्दी कैसे हो गयी है?पढ़ लिख कर हम क्या सीखे हैं?एक नाले का गंदा पानी भी नाले की गंदगी को बहा कर ले जाता है पर इंसानो की गंदगी जहाँ भी जाएगी उस जगह को दूषित ही कर देगी।नवजात को लिए वो खड़ा था और लोग उसके पास से चले ही जा रहे थे।दोस्तों में से एक नए कहा,”इसे गर्भवती बनाने वाला ज़रूर ही कोई नीच इंसान होगा,इस बेचारी को तो पता भी नहीं कि ये माँ बन चुकी है अखिर ये भी क्या करे ये तो पागल है न”। तभी अनिल ने जोर से कहा,” पागल ये नहीं,पागल हम दुनिया वाले हैं”।तभी पगली उठी और सिर के बालों को मुँह में चबाते हुए भीड़ के बीच आंसू टपकाते और हँसते हुए भीड़ में चली गयी।शिशु रोने लगा,लोगों के भीड़ और मोटर वाहनों के आवाज़ के बीच नवजात के रोने की आवाज़ खोती सी चली गई…

शिशिर पाठक

The winter cloud

Above hills through the vale,Across tree tops, among woods,You sway like a lad drunk with ale,

Bringing cold and chill frisking down the hill “O” winter cloud with the pines “ye” quadrille,

Not so far from your home in the hill top,lies a small stad full of colourful beetels who are beautifu and kopp-green and brown, buzzing around a lonely baum,they dwindle they flicker with a zeal without any fear,

Come down “ye” cloud to the small thorp,for the beetles are here to stay,the mist that you bring will blow over the torp and the haze with the grass blades shall swiftly sway.

–shishira pathak

बहुरूपिया

अचानक जंगल में पेड़ कम होने लगे।बड़े-बड़े वृक्षों के बीच बात चल पड़ी की यह हो क्या रहा है।सब ने मिलकर फैसला किया कि वो अपनी रक्षा के लिए किसी अपने को वोट देकर चुनाव में जिताएंगे। यह बात चारो ओर फैल गयी।कुछ दिनों के बाद जंगल की रक्षा का प्रस्ताव लेकर 4 लोग पेड़ों के पास आए।पहला एक भँवरा था उसने कहा कि मैं सभी पेड़ों का रात में भी परागण करूँगा,दूसरा बन्दर था;उसने वादा किया कि वो फलों की गुठलियों को दूर-दूर तक फैलाएगा,तीसरा बादल आया उसने कहा कि मैं जब भी यहाँ से गुज़रूँगा मूसलाधार वर्षा करता हुआ जाऊंगा; चौथा एक कुल्हाड़ी था उसने कहा मैं तो तुम्हारा अपना ही हूँ देखो मैं भी लकड़ी का ही बना हूँ। पेड़ों ने सोच-विचार कर कहा अब चुनाव के दिन फैसला होगा। चुनाव में जंगल के सभी जीव-जंतुओं ने भाग लिया।फिर जब चुनाव का परिणाम आया तो सब ने अपने चुने हुए नेता का खूब स्वागत किया। सिर्फ एक अजगर न पीपल सेे सवाल किया जंगल को बचाना था तो आखिर सभी ने कुल्हाड़ी को क्यों जिताया ।पीपल ने कहा,”अरे !ये सबसे अपना है,बाकी तो गैर हैं,ऊपर से ये लकड़ी का ही तो बना है”। अजगर बोलै,”लकड़ी?कैसी लकड़ी,जीवित लकड़ी या मृत?”। पीपल ने उसे नजरअंदाज कर दिया।लेकिन पेड़ पहले की तुलना में अधिक कटने लगे और जंगल खत्म हो गया। यही हाल आज की दुनिया का भी है।……शिशिर पाठक

पारग विशायण

सन 2098। विश्व की आबादी 23 अरब हो गयी है लेकिन सभी लोग मानसिक तौर पर काफी कमजोर और कई तरह की मानसीक बीमारियों से पीड़ित हैं जिनके बारे में पहले कभी नहीं सुना गया था।चिकित्सक इन बीमारियों का कारण पारा से जोड़ रहे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि पारे की मात्रा 2068 में हमारे वायुमंडल और जल के स्रोतों में अचानक 700 गुना बढ़ गयी जिसके चलते पूरी धरती विषाक्त बन गयी। अरबों सालों से पारा उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों में बर्फ के नीचे जमा रहा पर 2060-68 के बीच ध्रुवों के पूरी तरह पिघलने से पारा समूचे प्राणी तंत्र में फैल गया। देखा जाए तो ऊत्तरी ध्रुव से 19 करोड़ लीटर और दक्षिणी ध्रुव से 22करोड़ लीटर (real figures)पारा पानी,मिट्टी और हवा में घुल गया और लोगों को तांत्रिका तंत्र की बीमारियाँ होने लगी और 2090 आते-आते यह नौबत हो गई कि बीमारियों को पहचानना नामुमकिन हो गया। आज 23 अरब लोगों में से 20 अरब लोग पारा विषायण के शिकार है जिसका कारण सन 2000 से 2050 के बीच तापक्रम में वृद्धि होना ही था।

….शिशिर पाठक

Venus,Mars and Earth??

As per daily routine Raj was reading the morning newspaper.while frisking through the lines he saw a headline “VENUS,MARS AND NOW EARTH”!! He decided to read the content which goes like this-” Astrobiologists have discovered human skeletons on Venus and Mars and said that they were once inhabited by human race. But as per ecological succession every species renders its environment unlivable at the end,caused their destruction. They also found the existence of semidecayed radioactive plastics covering an area of the size twice of Africa which they concluded was uses for landfilling.The environment there was rendered so toxic that life de-evolved to Bacteria. Humans moved from Venus to Mars and to Earth to survive.So is earth next in the line to become a toxic-barren planet? We are to answer..

-Shishir pathak