अमेरिकन टूरिस्टर

बहुत गर्मी थी शाम को।यूं तो अमेरिकन टूरिस्टर बैग में लगे पहियों के सहारे मैं समान को घुड़घुडता हुआ सीढ़ियों की दहलीज तक तो ले आया था लेकिन बैग के अंदर कितना समान भरा हुआ है इसका अंदाज़ा मुझे कुछ ही पलों बाद मालूम होना था। मैं सीढ़ी के पास खड़ा हो कर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म की छत से टँगी एलसीडी स्क्रीन पर देख रहा था की मेरी ट्रेन किस प्लेटफार्म पर आएगी। स्क्रीन पर देखते हुए समय निकल रहा था पर ट्रेन के नाम का कोई अता-पता नहीं चल रहा था। तभी लाउडस्पीकर की आवाज़ आयी,” यात्रीगण कृपया ध्यान दे दिल्ली को जाने वाली ***** ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 4 पर आएगी”। मैन बिजली की गति से अमेरिकन टूरिस्टर को उठाया और अपने बाए कंधे पर टांग लिया। शुरू में तो कुछ पता नहीं चला और पहली 40-45 सीढियां तो युहीं खेल-खेल में पार हो गईं लेकिन 50विं सीढ़ी आते-आते मुझे लगने लगा कि कोई मुझे दायीं ओर धकेल रहा है आउट में दायीं ओर स्वतः ही चला जा रहा हूँ,कहीं दूर से,” मुझे खींचे डोर तेरी ओर हाये रब्बा” गाने की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी। मैं थोड़ा चौंक गया कि कितना रीयलिस्टिक गाना बनाया है बनाने वाले लेकिन थोड़ा ध्यान दिया तो मेरे कंधे पर टँगे अमेरिकन टूरिस्टर के वजन के चलते यह कमाल हो रहा था। दो-तीन सीढ़ियों के बाद सांस फूलने लगी,पसीने की बाढ़ आ गयी,बार-बार अमेरिकन टूरिस्टर कंधे से फिसल जाए और उसे पुरी जान लगा कर फिर से टांगना पड़े। किसी तरह साइड की रेलिंग पकड़ कर ओवर ब्रिज पर पहुंचा। ऊपर पहुंच कर मैने बैग को कंधे से उतारा और ट्राली के रूप में पहियों पर उसे घुड़घुड़ाने लगा।लेकिन जो में ब्रिज के नीचे था वो ऊपर न रहा। नीचे में खुशहाल,उमंग से भरा,ऊर्जावान,मुखमण्डल पर मुस्कान के साथ,एक उमंग से भरा रेल यात्री था लेकिन ऊपर आ कर पसीने में नहाया हुआ,उजड़े हुए बाल,आधी बंद हो चुकी आँखे, हांफता हुआ, बायीं ओर झुका हुआ बेहाल यात्री बन चुका था और मुस्कुराहट न जाने कहा गायब हो चुकी थी। थोड़ी देर मैने ओवर ब्रिज पर रुक कर अपनी साँसों को सामान्य होने के लिए छोड़ दिया।एक किनारे बदहाल हो कर खड़ा हो गया। रूमाल से पसीना पोछ-पोछ कर रुमाल भी पूरा भीज चुका था और ऐसा लग रहा था कि पसीने से ही पसीना पोछ रहा हूँ। तब याद आया कि पिट्ठु में तौलिया रखा है। उसे निकाल कर मैन पूरा बदन पोछ डाला। ब्रिज पर आते-जाते लोग अजीब तरीके से मुझे देख रहे थे।उनकें बदन पर पसीने की एक बूंद नहीं थी और मैं इधर नहा चुका था।फिर मैंने तौलिये को देसी स्टाइल में अपने गले से लटका लिया। फिर अमेरिकन टूरिस्टर को घुड़घुडते हुए नीचे उतरा। पलटफॉर्म नम्बर 4 पर पहुंच कर एक बोतल पानी ख़रीद उसे पीया लेकिन किस्मत का क्या कहना,अभी मेरी पिक्चर बाकी थी। छत से लटके डिस्प्ले पर कोच नंबर लिखा आ रहा था अब ये भी इस बार धोखेबाज निकलेगा ये किसने सोंच होगा।B1 कोच नम्बर के पास मैं तौलिये से पसीना पोछते हुए खड़ा हो गया। 5 मिनट में ट्रेन आ गई लेकिन ये क्या B1 तो बिल्कुल पीछे लगी थी न जाने ये ट्रेन वाले ऐसा जानबूझ कर करते हैं या गलती से ,अब फिर मैं अमेरिकन टूरिस्टर को घसीटता हुआ दौड़ पड़ा 6 बजे की ट्रेन है और 5:50 हो चुके हैं। लेकिन पिक्चर में एक और ट्विस्ट होना था। मेरे पिक्चर में ट्विस्ट के रूप में अमेरिकन टूरिस्टर का पहिया टेढ़ा हो गया,एक तो वजन इतना ऊपर से पहिये का सहारा था वो भी गया। किसी तरह जान झोंक कर खींचता हुआ बैग को अपने कोच तक ले ही आया। अपनी सीट संख्या 64 तक पहुंचा। अंदर जा कर जब बैग को सीट के अंदर रखने का टाइम आया तो कहानी में एक और ट्विस्ट हो गया। बैग इतना भरा हुआ था कि वो सीट के अंदर ही नहीं जा रहा था। पसीने से बेहाल,ऊपर से ये परेशानी।तौलिये से मैन अपना बदन पोछा फिर कुछ किताबों को निकाल कर पिट्ठु में रखा फिर जो बची कुची जान थी उससे मैने बैग को ज़ोर से ठूस कर सीट के नीचे आखिर डाल ही दिया। फिर जब सीट पर बैठने की बारी आई तो उस पर दो लोग पहले ही बैठे हुए मुझे देख मुस्कुरा रहे थे ,उनकी मुस्कुराहट देख समझ आ गया की ईनके पास टिकट नहीं है।मैं भी उनके साथ बैठ गया। TTE का राह देखने लगा कि महाशय कब आएंगे। बीच- बीच मे  चाय वाला आ जाता तो मै एक कप पी लेता,अंदर अब गर्मी कम लग रही थी। वो तो अच्छा था कि मैंने 3 महीने पहले सीट बुक लर ली थी इसलिए वातानुकूलित कोच में सीट मिल गई थी वरना इतनी गर्मी में मैं चीनी की तरह खुद के ही पसीने में घुल जाता। कुछ देर बाद TTE जी आये उन्होंने सीटें खाली करायीं और तब जा कर चैन से अपनी सीट पर बैठ पाया। घर से माँ का कॉल आ रहा था,फ़ोन उठाया तो माँ से मैने पूछा कि,” माता जी आपने अमेरिकन टूरिस्टर में ऐसा क्या डाला है।जान बच गई बस आज यही समझ लो”। तो माँ ने कहा छोटू के लिए निमकी, ठेकुआ, सत्तू और खाने का समान है उसका वजन है। तब पता लगा कि माँ के प्यार का वजन था जो इतना भारी था।

उम्र….

उम्र बड़ी सुंदर होती है

अपने बारे में कुछ नहीं बताती

सांस लेते-छोड़ते बस बढ़ती जाती है

समय और उम्र में कोई फर्क नहीं होता

उम्र इंसान की होती है और उम्र समय 

को पकड़े बस भागति ही जाती है,

बचपन से बूढापे तक धीमें- धीमें से

बहुत कुछ सीखाते हुए चुपके से आहिस्ते-आहिस्ते

चेहरे पर अनुभव की लकीरें बनाती रहती है

छुटपन में खेल में गिरते-उठते 

लकड़ी की गुलेल चलाते,आम और फल 

तोड़ते हुए दोस्तों की पहचान कराती है

बड़ेपन में दुनिया के लोगों की,

समाज की अच्छाइयों- बुराइयों से अवगत कराते हुए  

संसारिक सुख का अनुभव कराती है

फिर हाथ पकड़ कर मुस्कुराते हुए बुढ़ापे तक ले जाती है

कुछ लोग सोचते है,अब तो जीवन सफल हुआ

हँस कर पूछते हैं अब क्या है बाकी,तो वापिस मुस्कुरा कर 

उम्र फुसफुसाती है–

अभी तो शाम बाकी है,ताना- बाना पुरे जीवन का

लेखा- जोखा खुद के कर्म का अभी तो पूरा बाकी है

कल ही तो चलना सीखा था,

अभी ही तो क, ख, ग  लिखा था, कल ही तो

मास्टर जी ने पिटा था,अभी ही तो पहली तनक़्वाह आयी थी

कब कैसे समय बीता, कौन ले गया सब 

वक़्त बचाये थे खुद के लिए तुमने बरसों पहले मिलकर जब

उम्र के आखरी पड़ाव पर ही,जीवन के सबसे अधिक 

अनुभवी अवस्था मे ही तो हमे अनुभवों का हिसाब देना है,

हमने सही किया या गलत किया ये जवाब न जाने किस लीए देना है….

                                                                  — शिशिर

विजयविधि

रावण संग रथ-कवच देख विभीषण भयो अधीरा,जाय नाथ निकट पूछ्यो प्रश्न गम्भीरा ।

नाथ बिन रथ तेहि अउ न पद त्राणा,केहि बिधि प्रभु अब जितब रावण अति बलवाना।

सुनी एहि मुकुंद उत्तर दीन्हा,जेहिं रथ जय होत सो नहीं लौह-काष्ठ निर्माणा । 

साहस-धीरज सोंहि रथ चाका, सत-निश्च्य अउ दृढ़ता ध्वज-पताका। धीरज- बिबेक,स्वपन-श्रम ताहि चतुर घोरे;भक्ति- कृपा,परोपकार-संयम से ही ताहि रथ जोरे। प्रभु भजन सारथी सुजाना। बिद्या परसु और बुद्धि बाणा, सत्य-बचन-दान सोंहि रथ प्राणा।

अभेद कवच गुरु असीस अउ पूजा, बिजय उपाय एहि सिवाय न दूजा। ऐसो धरम रथ संग रहै जाके,जीत सकै सो एहि जग-संसार के।

                                                     -शिशिर पाठक

101…

कमरे में किसी चीज़ में हवा भरने और निकलने की कृत्रिम ध्वनी आ रही थी, कमरे में उस कृत्रिम ध्वनि के अलावे कोई और आवाज़ नहीं थी। अचानक चारों तरफ साईरन आवाज़ गूंजने लगी। पूरे कमरे में लाल बत्ती की रौशनी फ़ैल गयी। कमरे के बीचों- बीच एक लम्बा सा बड़ा धातु का चेम्बर नुमा डब्बा था। उसके ऊपर एक स्क्रीन लगी थी जिसपर अंग्रेज़ी में लिखा आ रहा था,”हाइबरनेशन कम्पलीट, सबजेक्ट हार्ट बीट…35…47,…..63….74….74….74, ब्लड प्रेशर स्टेबल , ब्रिदिंग रेट नार्मल, इवाकुऐशन स्टार्टस इन 20…19….,18….”। इस बीच पुरे कमरे में एक धुंए जैसी गैस खुद-ब-खुद भर गई। दिवार पर लगी एक और स्क्रीन पर लिखा आ रहा था,”ऑक्सिजनेशन सकसेसफूल”।इवाकुएशन पूरा होने में 5 सेकण्ड बचे थे। 5..4….3…..2……1, उस चेम्बर से काफी दाब के साथ गैस के निकलने की आवाज़ आयी। चेम्बर का ढक्कन किताब के पन्ने की तरह खुल गया। उसमे एक आदमी सोया हुआ था,जिसके मुँह पर एक किस्म की कृत्रिम श्वास नली और नाक के साथ मुंह को ढके हुए एक मास्क था। उस आदमी उसका सीना हवा भरने से फूल और पचक रहा था।  र्स्क्रीन और लिखा आया,” फ्लशिंग ऑफ़ लंग्स कम्पलीट इन 5…4…3…2…1।  वह आदमी एक झटके के साथ उठ कर बैठ गया और आँखे फाड़ कर ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगा मानो की किसी ने उसके फेफड़ों में पानी भर दिया हो। खासते -खासते थोड़ी देर बाद उसे आराम हुआ और वह लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगा। खांस-खांस कर वह थक गया था। उसने अपना मास्क उतारा। मास्क को हटाया तो उस मास्क से जुडी हुई श्वास नली थी जो की उसके फेफड़ों तक गयी हुई थी,धीरे-धीरे उसने उस श्वास नली को भी निकाला जिसके कारण वह थोड़ा और खाँसा।उसने उस मास्क और श्वास नली को दूर फेक दिया।वह अपने सीने को धीरे से सहला रहा था। उसकी नज़र दिवार पर लगी स्क्रीन पर गयी।वह उठ कर स्क्रीन के पास गया जिसपर लिखा आ रहा था,”पुट योर पाम ऑन द स्क्रीन”। उसने ऐसा ही किया उसके ऐसा करते ही लाल बत्ती और साईरन बंद हो गये,कमरे में सफ़ेद रौशनी आ गयी,दिवार से एक कुर्सी निकल कर आई, और उन दिवार पर लगी स्क्रीन से एक होलोग्राफिक प्रोजेक्शन वाली कृत्रिम महिला निकली जिसने उस आदमी को उस कुर्सी पर बैठने को कहा। वह आदमी उस कुर्सी पर बैठ गया। उस होलोग्राफिक महिला ने कहा,”मैं एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता हूँ (artificial intelligence) मेरा नाम हिन्दू देवी सरस्वती पर रखा गया है क्योंकि मैं अभी तक के मानव द्वारा अर्जित किये गए सारे ज्ञान और विज्ञान को जानती हूँ ,मेरे डेटाबेस में इंसान द्वारा लिखी गयी आजतक के सारी किताबों की लाइब्रेरी है।मुझे तुमहारे लिए ही मेरे रचयिता ने बनाया था ताकि मैं तुम्हारे मिशन को पूरा करने में तुम्हारी मदद कर सकूँ।तुम्हारा नाम 101 है,तुम एक सैनिक हो। तम्हारे जैसे कई सैनिक थे जो अब मर चुके हैं। तुम अपने मूल रूप के 101 नंबर के मानव क्लोन हो,लेकिन तुम बाकी के 100 क्लोनों से अलग हो इसलिए तुम्हे हाइबरनेशन में रखा गया था,ताकि जब दुनिया की 99. 9999% आबादी ख़त्म हो जाए तो जो बचे हुए लोगों को दूसरे गृह पर ले जाने में तुम हमारी मदद करो। तुम्हारे जैसे 500 क्लोन और भी हैं।तुम्हें उन्हें ढूँढना है और इसके साथ ही मानव सभ्यता को आगे ले जाने में हमे तुम्हारी ज़रुरत पड़ेगी उसके लिए तुम्हे दूरसे खोजे गये ग्रहों पर जा कर रहना होगा क्योंकि पृथ्वी मर चुकी है,यहाँ कुल मिला कर 50000 से भी कम मनुष्य बच पाएं हैं जिन्हें हाइबरनेशन में रखा गया है ताकि वे बूढ़े न हो सकें। यहाँ से निकलने के बाद शायद तुम्हें दुश्मन फौजियों का सामना करना पड़े इसलिए तुम्हें तैयार रहना है।बाहर हवा ज़हरीली है,और 700 साल से एसिड की बारिश हो रही है। इस ग्रह के वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड में यहां से 980 प्रकाश वर्ष दूर कृत्रिम स्टेशन में एक ग्रह की परिक्रमा कर रहे हैं।पिछले 30 सालों से वे भी हाइबरनेशन में सोए हुए हैं। ये रहे तुमारे हथियार और ये लाइफ-सूट”। ज़मीन से एक टेबल नुमा चीज़ निकली जिसपर हथियार और लाइफ-सूट रहजे हुए थे। 101 ने सूट पहना और अपना हथियार उठा लिया। लाइफ- सूट की बांह पर एक स्क्रीन था जिस पर 101 की स्थिति से 200 मीटर के गोलार्ध के दायरे का विवरण दिख रहा था। 101 ने एक हेलमेट भी पहन रखा था जिसके चलते वह होलोग्राम उसके हेलमेट के शीशे के अंदरूनी सतह पर दिख रही थी और उसे दिशा निर्देश कर रही थी। 101 अब बाहर था,बाहर बिलकुल अलग ही दुनिया थी। बादल गरज रहे थे, दूर-दूर तक सिर्फ मलबा पड़ा हुआ था।ज़मीन फटी हुई थी मानो किसी ने धरती को बीचों-बीच फाड़ डाला हो।अम्लीय वर्ष से निर्मित लंबे-लंबे और विक्राल नाले। लाखों -लाख जली भुनी गाड़ियों,स्कूटर,ट्रक,बस और अन्य वाहनों के कंकाल,जिन्हें देख ऐसा लग रहा था मानो किसी जाम में फसे हों और अचानक ही ऊष्मा के ताप से भून गये हों। ज़ोर से चलती हुई हवा और अपने साथ लिए हुए अम्लीय वर्ष की बूंदे जो की वाहनों पर टन-टन की आवाज़ सैकड़ो सालों से कर रही थी। कुछ वाहन अम्लीय वर्षा से गल भी गये थे और कुछ बचे हुए थे। दूर से एक कीं-कीं की आवाज़ आ रही थी। 101 ने उस आवाज़ पर अपने हेलमेट के स्क्रीन को फोकस किया तो एक झूला दिखा जो शायद तेज़ हवा से हिल रहा था,शायद किसी स्कूल का रहा होगा।आधा आसमान बिलकुल लाल और सुनहरे रंग की रौशनी से जगमगा रहा था और बाकी के आधे पर तारे खिले हुए थे। 101 ने आसमान की और देखा तो चाँद दिख ही नहीं रहा था। उस महिला की आवाज़ आयी उसने कहा,” 2047 में इंसान चाँद पर जा कर रहने लगा था और 2070 तक उसने चाँद पर अपना स्थायी ठिकाना बस लिया था,लेकिन जब 3014 में पूरी दुनिया लड़ पड़ी तो चाँद भी उस से बच नहीं पाया और चाँद को भी परमाणु हत्यारों से नष्ट कर दिया गया”। कुछ देर बाद तारों के बीच कुछ चमकदार चीज़ नज़र आने लगी। 101 ने पूछा,” ये क्या है सारा? महिला की आवाज़ आयी,” क्या कहा तुमने? 101 ने दोहराया,”ये क्या है? उस होलोग्राफिक महिला ने फिर पूछा,” नहीं,ये नहीं,तुमने मुझे किस नाम से बुलाया? 101 ने कहा,” सारा! क्योंकि तुम सरस्वती की बराबरी नहीं कर सकती इसलिए तुम्हारा नाम आज सारा,इसे भी तुम अपने डेटाबेस में डाल लो,अब ये बताओ की आसमान में वो क्या है? सारा ने कहा,” ठीक है लो कर लिया फीड मैंने अपने डेटाबेस में। और वो जो बिखरे हुए धुल जैसी चमकदार सुनहरी रेखा आसमान में जगमगा रही है वो चाँद का अवशेष है,अब बस धुल ही बची है जिसे आज से 300,000 साल बाद गृतवाकर्षण फिर से गोलाकर पिंड बना देगा पर उसे चाँद बुलाने वाला पृथ्वी पर कोई भी न होगा”। 101 ने सामने देखा तो बारिश धीमी हो रही थी,आसान में हलके बादल थे और लगातार बिजली बिना रुके चमक रही थी जिसके साथ बादल भी बिना रुके लगातार गड़गड़ा रहे थे पर और भी बादल आ रहे थे। 101 ने पूछा की हम किस देश में हैं। सारा ने कहा,” अभी जहां तुम खड़े हो वो हिन्दमहासागर का तल है,परमाणु हथियारों के विस्फोट से निकली हुई गर्मी ने दुनिया के सारे महासागरों को सुखा दिया है,अब सिर्फ एक ही सागर है जो की दक्षिण ध्रुव पर है क्योंकि वहां की बर्फ पिघल चुकी है”। 101 ने कहा,”मुझे और बताओ कि आखिर हुआ क्या है और कब हुआ है ? सारा ने कहा,” तुम आगे की ओर धीरे-धीरे अपने हथियार के साथ बढ़ते रहो, कोई खतरा होने पर मैं तम्हे बता दूंगी,तब तक तुम्हे पूरी बात बताती हूँ,”3014 में दुनिया 4 भागों में बंट गयी थी,एक- अमेरिका,दक्षिण अमेरिका और पूरा अफ्रीका,दूसरा- इंग्लैंड और यूरोप, तीसरा- रूस,भारत,ऑस्ट्रेलिया,बांग्लादेश,श्रीलंका,जापान,चीन, चौथा- मध्य एशिया,मलेशिया,इंडोनेशिया और बचे हुए बाकी के देश। उस वक़्त विश्व की आबादी 42 अरब हो गयी थी,चूँकि 2080 में खाद्य पदार्थों की पैदावार में 1960 के दशक की तरह फिर से क्रांति आयी थी तो आबादी 13 अरब से बढ़ कर 42 हो गयी थी पर आबादी बढ़ने के चलते उस वक़्त पूरे विश्व में मीठे पानी की कमी की मुसीबत आ पड़ी,सारी दुनिया अपने मीठे पानी के स्रोतों को बचा कर रखना चाहती थी जिसके चलते पानी की कमी वाले इलाकों से लोग पलायन कर दूसरे देशों में जाने लगे जिसके परिणाम स्वरुप एक विश्व स्तरीय सिविल-वॉर आरम्भ हो गया। दुनिया के देशों ने जब सिविल वॉर को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया तो कुछ कट्टर पंथ के समर्थकों ने आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बात बिगड़ती गयी और पहले 2 देश आपस में लड़ पड़े फिर 20 और फिर 200। बहुत बड़ा नरसंहार हुआ। लोग आपस में तो लड़ ही रहे थे लेकिन दुनिया की बड़ी सारकरें उन्हें रोकने के वजाए आपस में लड़ बैठीं। 3016 तक विश्व स्तर पर युद्ध छिड़ चूका था जो की आने वाले 3 -4 साल तक चला, इस दौरान किसी ने भी परमाणु,रसायनिक या जैविक हत्जियारों का इस्तेमाल नहीं किया था लेकिन 3017 में चाँद पर स्थित परमाणु फैसिलिटी के मैं कंप्यूटर को किसी कट्टरपंथी गुट ने हैक कर लिया और वहां से पृथ्वी की और 15 परमाणु मिसाईलें दाग दी,जो की पृथ्वी के 15 सबसे बड़े शहरों पर आ गिरे,उस साल सारी दुनियां में कुल मिला कर 250 करोड़ लोग मारे गए थे। सबसे ताकतवर देश चाँद को नष्ट करने को उतावले हो उठे थे क्योंकि उनकी नज़र में चाँद ने पृथ्वी से विद्रोह कर दिया था,पर चाँद की सरकार नतमस्तक भाव में इस से इनकार कर रही थी, लेकिन कुछ समझदार देश चाँद के नष्ट होने से जो पृथ्वी पर दुष्प्रभाव पड़ेगा उस अवगत थे इसलिये वे ऐसा होने नहीं देना चाहते थे। इस बात पर युद्ध और भी भयानक रूप लेने लगा था। अब लोग रसायनी हत्यारों का इस्तमाल करने लगे थे,जिस से पृथ्वी का वायुमंडल पूरी तरह दूषित हो गया। गंभीर स्थिति को देखते हुए युद्ध तुरंत ही रोक दिया गया और विश्व के सभी 200 देशों ने मिलकर एक वार्ता बुलाई की इसका हल कया हो,लेकिन कुछ और ही होना था। 21 दिसम्बर 3017 को वह वार्ता होनी थी और हो भी रही थी,उस वार्ता को अंटार्टिका में बनाये गए नेशन 200 हाउस नामक बिल्डिंग में होना था। उस दिन दोपहर के दो बजे खबर आयी की चाँद को नहीं नष्ट किया जायेगा और अब लड़ाई बंद कर दी जायेगी,मीठे पानी के सभी स्रोत को दुनिया के सभी लोगों के लिए उपलब्ध कराया जायेगा। लोग अपने घरों में बैठ कर इसका प्रसारण देख ही रहे थे और खुशियां भी मना रहे थे की अनहोनी हो गयी। न जाने कहाँ से और किसने एक साथ 6 परमाणु मिसाइल नेशन 200 बिल्डिंग और अंटार्टिका की और दाग दिए और सब कुछ खत्म हो गया। दुनिया ने समझा की ये फिर से चाँद के वासियों ने किया है और उसे नष्ट कर दिया। इसके बाद जो देश चाँद को नष्ट करने के विरोध में थे उन्होंने बाकी के देशों पर परमाणु,रसायनिक और जैविक हथियारों से हमला कर दिया। जवाबी कार्यवाही में भी वही हथियार चले और सारी सृष्टि नष्ट हो गयी”। 101 रुक गया उसके सामने एक विशाल मैदान था,जिसके यहां-वहां ईंट के इग्लू नुमा घर थे।उसने सारा से पूछा ये क्या चीज़ हैं? सारा ने जवाब दिया,” ये जो तुम देख रहे हो इसमें परमाणु युद्ध के बाद बचे लोगों ने अपने परिजनों के मृत शरीर को रखा है।यहां इस मैदान में हज़ारों ऐसे इग्लू नुमा घर मिल जायेंगे,इस मैदान की लंबाई और चौड़ाई 18 वर्ग किलोमीटर है”। 101 उस मैदान को निहार रहा था,फिर उसने पूछा,” नहीं तुम कुछ गलत कह रही हो ,इन्हें देख कर ऐसा लगता है कि की ये किए धर्म विशेष से सम्बन्ध रखते हों,और यह उस धर्म के मानने वालों का अंतिम संस्कार करने का एक तरीका हो या फिर ये कोई धर्मिक स्थल है”। सारा ने कहा,” चूँकि मैं एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता हूँ इसलिए हंस नहीं सकती लेकिन तुमने जो बात कही है उस पर कोई हंस ही देता क्योंकि दुनिया को धर्म का दामन छोड़े हुए कई साल गुजर चुके थे तब जा कर ये इग्लू नुमा बनावट बनाई गई। मैं जिस वक़्त की बात कर रही हूँ उस समय न तो कोई धर्म था,न ही रेस और न ही कोई अमीर या गरीब। यह सब विनाश मानव ने अपने सबसे समृद्ध काल में किया था, सब बराबर थे और उन्हें रोकने वाला कोई भी नहीं था क्योंकि सबको किसी दूसरे की कोई गलती दिखती ही नहीं थी। मानव जब से पृथ्वी और जन्मा था उस दिन से वह एक दूसरे की गलतियों को ढूंढता आया है, और कई लड़ाइयां गलती को ढूंढने और गलती करने वाले को जिम्मेवार ठहराने के लिए ही हुईं थीं,लेकिन ये युद्ध उन सबसे अलग था,यहाँ सब खुश थे,कोई गलतियाँ भी नहीं करता था और न ही किसी को जिम्मेवार ठहराया जाना था,फिर भी दुनिया खत्म हो गयी”। 101 फिर से बोला,” सारा तुम भले ही अब तक की सारी बातें जानती होगी लेकिन तब भी तुम गलत हो,क्योंकि जब सब कोई खुशहाल थे तो फिर क्यों लड़ पड़े?। सारा ने जवाब दिया,” वे इसलिए लड़ मरे क्योंकि उनके बीच एक होड़ छिड़ गई थी,इस बात की होड़ की चाँद पर जवाबी हमला हो या नही। और इस बात को लेकर की कौन सही है,क्योंकि सब बराबर थे सब कोई खुद को किसी से कम नहीं समझते थे, इसका परिणाम यह हुआ की वे सब आखिर कार लड़ मरे गए,….. अरे रुको सामने कोई है मुझे चेक करने दो”। सारा आगे 200 मीटर तक का जायज़ा ले रही थी,101 की बांह पर लगी स्क्रीन पर एक रेडियो सिग्नल आया। 101 ने अपने हेलमेट पर लगे कान के पास एक बटन को दबाया तो वह सिग्नल उसके हेलमेट में बजने लगा, वह सिग्नल था,”मैं 664 स्ट्राइक फ़ोर्स का कमांडर बात कर रहा हूँ, कट्टरपंथियों ने पूरी दुनिया पर 80-85 जैविक,रासायनिक और परमाणु हथियार चलाये हैं, नागरिकों से अनुरोध है कि वे अपने घरों में रहें,सड़क पर न निकलें,अपने बच्चों और महिलाओं का ध्यान रखें,आपकी सेना और सरकार आपके साथ है”। यह संदेश बार-बार दोहरा रहा था फिर खुद ही बंद हो गया। सारा ने कहा,” ये कुछ नहीं है,700 साल पहले किसी ने रेडियो ट्रांसमीटर से यह संदेश भेजा था जो यहां से 90 मीटर पर है और यह संदेश एक रेडियो में आज भी चल रहा है,शायद वहाँ कोई सैनिक पोस्ट रही हो,आगे बढ़ते रहो पर सावधान रहना,यह दुश्मन की चाल भी हो सकती है”। 101 ने फिर पूछा,”700 साल से रेडियो कैसे चालू है,उसकी बैट्री खत्म नही हुई क्या? सारा ने कहा,”वह ट्रांसमीटर 3400 ईसवीं में बनाया गया था जिसमे रेडियो सिग्नल ही रेडियो ट्रांसमीटर के लिए ऊर्जा स्रोत का काम करती थी”। 101 ने सवाल किया आज कौन सा साल है? सारा थोड़ी चुप हो गयी और फिर बोली,” मुझे मालूम था कि तुम ये सवाल ज़रूर करोगे। देखो चाँद के ख़त्म होने के बाद पृथ्वी अपनी सूरज की ऑर्बिट से एक छोटे पत्थर की भांति छिटक गयी और अपनी धूरी पर न घूम कर अजीब ही तरह से घूमने लगी,धरती की चुम्बकीय शक्ति पर भी इसका प्रभाव पड़ा और 8 महीने के लिए चुम्बकीय शक्ति चली गयी। इसका फल ये हुआ की सूरज से आने वाली रेडियोएक्टिव तरंगे जो धरती की चुम्बकीय शक्ति से दूर कर दी जातीं थी वे सीधे धरती पर पड़ने लगी जिसके कारण उस वक़्त धरती की सतह पर मौजूद 93% जीवित जीव क्षणों में भून गये। जो कुछ बचे थे उन्होंने धरती के अंदर बसने की आदत बन ली। धरती के अंदर रहते हुए इंसानों ने कृत्रिम ढंग से पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति लौटाने की कोशिश तो की जो कुछ हद तक लौट भी आई पर पृथ्वि की धुरी को न सुधार सके जिसके चलते आज सुरज उत्तर-पश्चिम से निकलता है और दक्षिण-पूर्व में ढलता है। वातावरण और ओजोन परत नष्ट होने के कारण दिन के वक़्त सतह का तापमान 156 डिग्री सेल्सियस होता है और रात में शुन्य से 30-35 डिग्री कम। दिन भर यह अम्लीय वर्षा होती है,तापमान बढ़ रहता है,कहने को ये हमारी धरती है लेकिन अब नर्क के दर्शन देती है। और रहा तुम्हारे सवाल का जवाब तो ये साल 3793 है। to be continued…..

कल


“कल”,….मौसम के समान तू भी बदलेगा

तुझे भी तोड़- मरोड़ कर वक़्त बढ़ेगा

अकड़ के साथ जो तू इंसानों के भविष्य को

अपनी मर्जी से बदलता रहता है

क्षमता से मानव अपनी तुझे भी बदल सकता है

अरे “कल”,तू पहले देता है दरिद्रता,

देता तू परेशानियां,तू सुनाता है धित्कार

लेकिन इंसान दृढ़ता से अपनी

है करता तुझे दरकिनार , तेरी और इंसान की लडाई

चलती रही है और आगे भी चलेगी

पर इंसानों के आगे तुझे “कल” हार मान नी ही पड़ेगी

                                                          -शिशिर पाठक

Thoughts…

Let the life come into sunshine           With dreams and aspirations in your mind

Life is hard but still its divine                Like a holy mountain shrine

Stop your craving for more                         Be happy with what you have in store

Waves will definitely strike the shore Wait for you turn in front of the door

In the mean time you must behave       You must perform the acts of brave    Like a leo in his cave                               Until your name in history books is engraved…

                                          ~shishira pathak