लिखो

कभी जो तुम अकेले बैठे,कोई धुन गुनगुनाते,हाथों में सादे पन्ने और कलम लिए,सामने तुम्हारे बारिश की झीसी हो और हल्की हवा में बूंदे तैर रही हों।

साथ हो मिट्टी की खुशबू ,मन्द-मन्द धीमी हवा जो सिहरन दे जाए कानों में पत्तों पर बूंदों के पड़ने की आवाज आए।

जो एक झलक आसमान को देखो ,तो बादल झूमते दिखें और बिजली की चमक उनके बीच बूंदो के बादलों से बिछड़ने की गहराई दिखाए।

शांत वातावरण,बारिश की आवाज़,आहिस्ता चलती ठंढी हवा और सिर्फ तुम,पन्ने और कलम।

पन्नों पर प्रकृति की आवाज़ लिख डालो,लिखो जो बारिश की आवाज़ बने,जिसमें धरती की खुशबू, हवा की ठंडक और तुम्हारी सिहरन हो।

लिखो की खुद अक्षर बन जाओ,बारिश की स्याही लेकर,कलम की नोक से खुद बह जाओ, लिखो यूं के मन्द पवन से बहो।

लिखो जो सरगम बनें,पत्तों के हरे रंग से लिखो की बादल की गरज के बन कहीं कोई तार छेड़ जाएं,पढो तो बोल तुम्हारे काले बादलों बीच सुनहरी धूप की रोशनी बन जाएं।

कभी कहीं तुम अकेले बैठो,हाथ में सादे पन्ने और कलम लिए…

—शिशिर पाठक

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सोमनाथ…

महेश के दादा जी रोज़ सवेरे उठ कर शिव पूजा के लिए शिवमंदिर जाते थे। वो 90 साल के हो चले थे लेकिन रोज़ सुबह उठने में वो कभी भी हिचकिचाते नहीं थे। मंदिर जा कर शिवलिंग की पूजा और महादेव का ध्यान करना उन्हें सर्वप्रिय था। चाहे कुछ भी हो वे मंदिर जा कर शिवलिंग की पूजा करना नहीं भूलते थे। घर पर भी वे सारा दिन शिव आराधना में ही लगे रहते थे। उनकी पत्नी का 25 वर्षों पहले देहावसान हो चुका था और वो लगभग संसार से कट से चुके थे। पूजा-पाठ छोड़ कर किसी और चीज़ की उन्हें रुचि नहीं थी और अगर शिव के अलावे वो किसी के करीब थे तो वो था उनका पोता महेश। पूजा से लौटने पर वे महेश को अपनी गोद मे बिठा कर शिव भक्ति का पाठ पढ़ाते,और साथ में कुछ श्लोक भी याद करवाते थे। महेश अभी बस 4 साल का ही था लेकिन दिमाग से काफी तेज था। जो भी उसके दादा उसे याद करवाते थे वो उस चीज़ को जल्दी ही आत्मसात कर लेता और भूलता नहीं था। महेश की माँ कान्वेंट स्कूल में पढाती थी और उसे अपने ससुर की रूढ़िवादी सोच कुछ पसन्द नहीं थी। महेश के पिता बैंक में नौकरी करते थे और वे भी नए विचारों और ट्रेंड को फॉलो करने वाले लोगों में से एक थे। अब भला जब माता पिता दोनो नवीन विचारों के हों तो वो अपने पुत्र को धर्मिक- रूढ़िवादिता के मार्ग पर चलता पसंद कैसे कर सकते थे। एक दिन अपनी पत्नी के बहकावे में आकर महेश के पिता ने अपने पिता से बात की की,”आप महेश को धर्मान्ध न बनाये आजकल धार्मिकता को रूढ़िवादी और पिछड़ा समझ जाता है। इसे अंधविश्वास से दूर रहने दें और इसकी बुद्धि का विकास होने दे वरना ये भी आज के समाज में फैले कुविचारों में फंसा रह जायेगा”। महेश के दादा ने मुस्कुराते हुए कहा,” तुम जो सोंच रहे वो गलत है, मैं इसके धर्मान्ध नहीं बल्कि असली ज्ञान दे रहा हूँ। काश मुझे ऐसा ज्ञान देने वाला कोई महेश की उम्र में मिल गया होता तो मैं 35 वर्षों से अज्ञानता के अंधकार से दूर रहता”। महेश के पिता ने पूछा,” मैं कुछ समझा नहीं,आप खुल कर बताइये”। महेश के दादा बोले,” इधर आओ। लगता है तुम्हे अब ये बात बता देनी चाहिए। ये बात तुम्हारी माँ जानती थी पर तुम्हे नहीं बताई। वो बोलती थी कि एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन मुझे खुद ये बात तुम्हे बतानी पड़ेगी”। महेश के पिता ने फिर पूछा,” ऐसी क्या बात है। आपकी बातों से लगता है कि कोई गम्भीर बात है जो आपने मुझसे छुपाई है”। महेश के दादा ने मुस्कुराते हुए कहा,” बेटा पहले महेश को यहाँ से ले जाओ क्योंकि मैं जो बताने जा रहा हूँ उसे अगर उसने सुना और अगर समझ लिया तो इस कच्ची उम्र में शायद डर जाए”। महेश के पिता ने अपनी पत्नी की ओर इशारा किया और महेश की माँ उसे फुसला कर ले गयी। महेश के दादा ने कहा,” यह बहुत पुरानी बात है।उस वक़्त मैं 22 साल का लड़का था। और अंग्रेजों के ज़माने में आई नई तकनीक पर पूरा भरोसा करता था। मेरी भी सोच तुम्हारे जैसी ही थी। पूजा-पाठ और धर्मिक विचारों से में कोसों दूर रहता था। एक दिन की बात है। मैं और मेरे 5 दोस्त,हम सब ने मिल कर गुजरात में सोमनाथ मंदिर जाने का प्लान बनाया। मैं वैसे ही धार्मिक स्थानों में जाना पसंद नहीं करता था पर मेरे 5 दोस्तों में से 3 की शादी तय हो चुकी थी और वे काफी धार्मिक विचार के थे। उन्होंने मुझसे कहा कि भाई ये आखरी बार हमलोग कहीं जा रहे हैं,आगे चलकर शायद हम मिलेंगे या नहीं ये हम में से कोई नहीं जानता। शायद उन्हें आभास था कि हम लोग उस यात्रा के बाद नहीं मिल पाएंगे,क्योंकि 1947 में बंटवारे में कौन-कौन मारा जाएगा ये किसी को पता नहीं था।उनकी बात मान कर मैंने भी हाँ बोल दिया। दूसरे दिन हमलोग बैलगाड़ी से सोमनाथ पहुंच गए। सोमनाथ मेरे गांव से 23 कोस दूर था। हम सब सुबह निकले और दूसरे दिन शाम को सोमनाथ की पावन भूमि तक पहुँच गए।हुम सब बहुत खुश थे लेकिन मुझे कुछ अजीब आभास हो रहा था। तुम मानोगे नहीं पर रास्ते भर जहाँ भी बैलगाड़ी सुस्ताने को रुकती वहाँ पर एक लबादा पहने और लाठी पकड़े आदमी हमेशा खड़ा दिखता था। और वो किसी और को नहीं मुझे घूरता रहता था। बाकी किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया पर मैें उसे हर पड़ाव पर ठीक-ठीक पहचान पा रहा था। सोमनाथ पहुंचकर मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था ,पर वो आदमी नज़र नहीं आ रहा था।मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो वो कोई लुटेरा हो पर सोमनाथ में मुझे वो नज़र नहीं आया। होटल या किराये के कमरे का भाड़ा पता करने पर हम सभी को यह पता चल गया कि कमरे का किराया हम सबकी औकात के बाहर है क्योंकि जो पैसे ले कर आये थे उनमें से ज्यादातर बैलगाड़ी वाले को ही देने पड़े थे और अभी तो लौटना भी था। हम सब ने मिल कर नए सोमनाथ मन्दिर परिसर में ठहरने का सोंचा। शाम को मंदिर में भीड़ बढ़ रही थी और हम सब ने वहां की आरती और पूजा का दर्शन किया और सब ने मिलकर रात को पैसे जमा कर थोड़ा बहुत खाना खाया। थोडी देर बाद भीड़ कमने लगी और देखते ही देखते सारे लोग अपने घर चले गए। मन्दिर में हमने पंडीजी से आग्रह किया कि आज की रात वे हमें मंदिर के परिसर में रुकने देवें, और थोड़ी मान- मन्नवल के बाद वे भी मान गए। हम सब बहुत थक चुके थे और कुछ देर हंसी मजाक करने के बाद सब सो गए।लेकिन मेरे दिमाग में अभी भी कहीं डर बैठा हुआ था कि कहीं वो आदमी चोर या डाकू तो नहीं और अगर है तो अभी कहा होगा। यह सोचते -सोचते हुए मैं कब निद्रा में चल गया मुझे पता भी नहीं चला। माहौल बिल्कुल शांत था और मन्द-मन्द ठंडी हवा चल रही थी। तभी मेरे कान में एक अवाज़ आयी तुम्हे सोमेश्वरनाथ ने चुना है। मेरी हृदय की गति कुछ ही पलों में इतनी अधिक हो गयी कि मैं बता नहीं सकता। मैं उठ कर बैठ गया और इधर-उधर देखा। कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। मैंने अपने दोस्तों को उठाना चाहा पर वो नहीं उठे। फिर आवाज़ आयी, वो नहीं उठेंगे,उन्हें सोने दो। डरो मत,तुम्हे मुझसे कोई हानि नहीं होगी।मैं जैसा-जैसा कहता हूं तुम वैसा-वैसा करो। मैं काफी डर गया था और ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था,की तुम कौन हो ,सामने आओ,तुम्हे क्या चाहिए। आवाज़ आयी, मंदिर से कुछ दूर पुराना सोमनाथ का मंदिर है, वहाँ के गर्भगृह में एक काला पत्थर का टुकड़ा है जो कि गज़नी के द्वारा तोड़े गए पौराणिक शिवलिंग का असली टुकड़ा है,जिस पर आजतक किसी की नज़र भी नहीं पड़ी है। उस पत्थर पर लगभग 1000 साल से किसी ने श्रद्धा पूर्वक जल अर्पण नहीं किया है तुम उस पत्थर के ऊपर जल अर्पण करो और उसे अपने साथ ले जाओ। में डरकर जैसे ही मंदिर परिसर से बाहर निकला वैसे ही दूर एक खण्डहर से चांदनी रोशनी आयी मानो जैसे किसी ने टॉर्च जलाया हो। आवाज़ फिर से आई, उस रोशनी की ओर जाओ। मैं कुछ डरा हुआ धीरे-धीरे उस रोशनी की ओर बढ़ता गया।मैं अपने कदम बढ़ा ही रह था कि मैंने अपना सिर उठा कर चाँद की ओर देखा,वह खूब चमक रहा था और देखने में बहुत सुंदर लग रहा था।मैंने मन में सोंचा कितना सुंदर चांद है तभी फिर से आवाज़ आयी, आज पूर्णिमा है और हज़ारों साल पहले जब खण्डहर की जगह चन्दन की लकड़ी से बना सोमनाथ मन्दिर था उस दिन यहाँ हजारों लोग पूजा करने यहां आते थे और ऐसा वातावरण बनता था जिसकी आज कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। मैन पूछा कि तुम कौन हो ,तो उत्तर मिल, कुछ क्षणों बाद तुम्हें सब पता चल जाएगा। मैं कुछ और नज़दीक पहुँचा की हवा और तेज़ हो गयी और खंडहर से ॐ की ध्वनी प्रवाहित होने लगी। खंहर के जैसे-जैसे में नज़दीक आता जाता वैसे-वैसे ॐ की ध्वनि तेज़ होती जाती। कुछ और नज़दीक गया तो डमरू की ध्वनि भी आने लगी। कुछ पलों बाद में उस विशाल खंडहर के बिल्कुल सामने था। उस खण्डहर की बाहरी दीवार पर एक स्फ़टिक का खोखला ॐ लगा हुआ था जो कुछ क्षत-वीक्षत अवस्था में था लेकिन जहां तक मेरी समझ की पहुँच है वायू के उस खोखले स्फ़टिक के ॐ से प्रवाह होने पर ॐ की ध्वनि आ रही थी।मैं उस चांदनी रोशनी की ओर बढ़ा जो की खण्डहर के गर्भगृह से आ रही थी। अंदर की ओर बढ़ते हुए मुझे वो लबादे ओढ़ा आदमी भी मिला।देखने मे वो बहुत बलशाली और विकराल प्रतीत हो रहा था। उसने मेरी आँखों मे देखा और शायद विचारों से मुझसे बात की और कहा, गर्भगृह के अंदर जाने से पहले तुम्हें पवित्र होना पड़ेगा। हाथ के इशारे से उसने विचारों के माध्यम से मुझे खण्डहर के प्रांगण में एक ढहा हुआ कुआँ दिखाया और बिना होंठ हिलाये कहा,कुएँ से जल निकाल कर तुम स्नान कर लो और अपनी अंजलि में जल ले कर गर्भगृह में प्रवेश करना और उस पवित्र पत्थर पर 9 बार ॐ नमः शिवाय का उच्चरण कर अर्पण करना। मैन वैसा ही किया। कुएँ से जल नकाल कर स्नान किया और एक अंजलि जल लेकर गर्भगृह में प्रवेश किया। वहाँ एक पत्थर का टुकड़ा था जिसमें एक हीरा लगा हुआ था और चाँद की रोशनी पड़ने पर जगमगा रहा था। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि जैसे ही मैने ॐ नमः शिवाय बोला वैसे ही उस पूरे खण्डहर में ॐ की हज़ारों ध्वनि गूंजने लगी मानों वहाँ हज़ारों लोग एक साथ ॐ नमः शिवाय और ॐ शांति का लगातार उच्चारण कर रहे हों। मैं भयभीत भी हो रहा था कि तभी वो लबादा ओढा आदमी फिर मेरे सामने प्रकट हो गया और मेरे कन्धे पर अपना हाथ रखा जिस से मेरा एक कंधा थोड़ा झुक गया।मेरी आँखें फ़टी रह गयी,इतना बकशाली व्यक्ति मैने आजतक कभी नहीं देखा था।उसके मेरे कंधे पर हाथ रखने से ऐसा लग की मानों कीसी ने 1 मन की भारी बोरा मेरे कन्धे पर रख दीया हो। उसने फिर विचारों के माध्यम से कहा, डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूँ जाओ शिवलिंग के टुकड़े पर जल डालो। उसकी बात मान कर मैंने 9 बार ॐ नमः शिवाय का उच्चारण किया। जैसे ही मैन 9वां उच्चारण किया उस खण्डहर में चंदन की सुगंधित महक जाग उठी। फिर उस आदमी ने कहा,अब ये जल और तुम दोनों पवित्र हो चुके हो। अब जल को इस पत्थर पर अर्पण करो। मैन उसकी बात मान कर अपनी अंजलि में भर जल उस पत्थर पर डाल दिया। जैसे ही मेरे अंजलि में पड़े जल की पहली बूंद उस पत्थर पर पड़ी वह पथ्थर सोने की तरह चमक उठा और हवा में तैरने लगे। पूरे खण्डहर में हज़ारों शंख-नाद,घंटी,विशाल डमरू के डम…डम…डम….डम की ध्वनि ज़ोर-ज़ोर से गूंजने की आवाज़ आने लगी।मैं बहुत डर गया था और भाग कर गर्भगृह से बाहर निकल गया।तभी मेरे पीछे एक बैल के सिर और इंसान के शरीर वाला जीव आ खड़ा हुआ और ज़ोर से बैल की तरह 2 बार अपना सिर धुनते हुए चिंघाड़ा और कुछ कदम चल कर मेरी ओर आया। चिंघाड़ने की आवाज़ पूरे शांत वातावरण में भयानक कानो के पर्दे चीर डालने वाली गूंज के साथ दूर-दूर तक फैल गई। वैसी गूंज कोई सुन ले तो उसे लगेगा कि मानो कोई दिवार आकर उससे ज़ोर से टकरा गई हो। चिंघाड़ा कि गूंज सुन कर मेरी हड्डियां तक कांप उठी और भय से पसीने की बाढ़ आ गई। किसी विकराल जीव के चलने से खुरों की आवाज आई मानो कोई बड़ा ही वजनी प्राणी धम्म-धम्म कर के चल रहा हो। लंबी-लंबी सांसे लेते हुए वह मेरी ओर बढ़ रहा था। अत्यधिक भय के साथ कांपते हुए मैं सिर झुकाए हुए आंखे बंद कर धीरे से पीछे की ओर मुड़ा और हाथ जोड़ कर अपना सिर उठाया। सकपकाते हुए मैंने अपनी आंखें खोली और जो मैंने देखा वो मैं दुबारा नहीं देखना चाहूँगा। एक बैल के सिर वाला प्राणी दो खुरों पर खड़ा था और मुझे देख बिजली की गति से मेरे मुख से 5 फुट की दूरी से अपनी पूरी ताकत से चिंघाड़ा उठा। उसकी चिंघाड़ा में इतनी शक्ति थी कि उसकी ध्वनि तरंगें मुझसे होकर गुजर गई और मुझे ऐसा लगा मानो मेरी आत्मा को अपने संग लेती गई हो। वह देखने मे 24 – 25 फुट का होगा। देखने मे वह बहुत ही अधिक बलिष्ठ,बलशाली और विकराल दिख रहा था। उसके पूरे शरीर में बड़ी मजबूत और बड़ी-बड़ी चटटान नुमा उभरी हुई मांसपेशियां थी। उसका पूरा शरीर नग्न था और कपड़ों के नाम पर उसने एक छाल पहन रखी थी। मैं उसे देख कर उतना भयभीत अपने पूरे जीवन में नहीं हुआ था। ऐसा लग रहा था कि कोई पहाड़ मेरे सामने आ गया हो। डर के मारे में घुटनों पर बैठ गया।उसने इस बार विचारों के माध्यम से नहीं बल्कि बोली से मुझसे बात की।बादल की गर्जना के समान उसकी बोली थी जो पूरे वातावरण में गूंज रही थी। उसकी बोली से धरती में कम्पन हो रहा था जिसे मैं अपने पैरों तले महसूस कर पा रहा था। उसके बोलने की आवाज़ से यह पता चल रहा था कि उस प्राणी के शरीर मे अदम्य शक्ति है। अपना एक हाथ उठा कर अपनी तर्जनी को मेरी ओर कर वो प्राणी मुझसे संस्कृत में वार्ता कर रहा था लेकिन मुझे सब कुछ हिंदी में ही समझ आ रहा था। उसके बात करने के तरीके,डील-डौल, शारिरिक भाषा से स्पष्ट पता चल रहा था कि वो बिल्कुल ही निडर जीव है और सृष्टि में उसे किसी का भी भय नहीं है।दोनो कलाईयों में मोटे-मोटे स्वर्ण के कड़े जो कि इतने बड़े थे कि उनके गोलार्द्ध में 2-3 आदमी आ जाएं। नाक में सोने का भारी-भरकम नथ था।उसकी विराट छाती पर सोने का मोटा चमकता हुआ एक प्लेट जो उसके मांसपेशियों से चिपक हुआ था,और उसे देख कर लग रहा था कि मानो किसी ने सोने के प्लेट को उसकी छाती पर ढाल दिया हो।उसने कहा, मैं महादेव का भक्त नंदी हूँ।तुम आज धन्य हो गए। आज लगभग 1000 वर्षों बाद किसी ने सोमनाथ के शिवलिंग का जलाभिषेक किया है।डरो नहीं,और उठो,उठकर गर्भगृह के अंदर जाओ और उस पथ्थर को अपने साथ अपने घर ले जाओ। तुम्हारे घर के पास जो शिव मंदिर है वहाँ एक नंदिकेश्वर नाम का पंडित है। यह पत्थर उसे दे देना और जीवनपर्यन्त उस मंदिर जा कर हर रोज़ 9 बार ॐ नमः शिवाय का उच्चारण कर जलाभिषेक करना। बाद में तुम्हारे देहावसान बाद तुमरे पुत्र और उसके बाद तम्हारे पौत्र को उसका जलाभिषेक करने होगा।तब तक तुम्हारे परिवार वालों को इस पत्थर का देखभाल और जलाभिषेक करना होगा। तुम्हारी तीसरी पीढ़ी के बाद फिर से किसी और को विधाता चुनेंगे।तब तक के लिए तुम इस कर्म से 3 पीढ़ियों तक बंध चुके हो।मेरा कार्य पूरा हुआ और आगे का कार्य तुम्हे ही सम्भालना है। इतना बोलकर नंदी पीछे मुड़े और वहाँ से चले गए लेकिन उनके जाने के आहटों की आवाज़ धम-धम कर आ रही थी।मैं उन्हें जाते हुए देख रहा था। विकराल शरीर झूम-झूम कर चल रहा था फिर अगले ही पल उनके बलिष्ठ शरीर से तेज़ चमक निकली और वो बैल का रूप धारण कर चले गए। मैं वहाँ अकेला रह गया था। इतना कुछ देखने के बाद भी मुझे डर लग रहा था।लेकिन जैसे नंदी महाराज ने कहा था वैसा मुझे करना था। मैं हाथ जोड़ कर शिव-शिव-शिव बोलता हुआ गृभगृह के अंदर गया और उस चमकते हुए हवा में लटके पथ्थर को पहले प्रणाम किया और फिर उसको मैन कांपते हुए हाथों से पकड़ा। जैसे ही मैन उसे पकड़ा मेरे अंदर एक बिजली दौड़ आदि और मुझे बिजली का झटका लगा। मेरे पूरे बदन से सोने की चमक और आग की लपट उठने लगी फिर अचानक मुझे कुछ दिखाई पड़ा।मैंने खुद को आसमान में खड़ा पाया। काफी तेज हवा के चलने का आभास हो रहा था।ऐसा लग रहा था कि मुझे कोई उड़ा कर कहीं ले जा रहा हो।भय से मैंने अपनी आंखें बंद कर रखी थी। दूर से मेरे कानों में धीमी-धीमी सी मंत्रोच्चारण की ध्वनि आ रही थी। मैन अपनी आँखें खोली तो स्तब्ध रह गया। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी और मैं हवा में था। नीचे धरती पर हजारों-हज़ार लोग खड़े हो कर झूम रहे थे। मंत्रोच्चारण की ध्वनि तेज़ हो गई और थोड़ा ध्यान लगा कर देखा तो लोग मशालें हाथों में लिए मंदिर के सामने झूम रहे थे मानो नशे में हों।जिधर देखो उधर लोग ही लोग थे। ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि दिए के लौ और मशालों की अग्नि दाएं और बाएं झूमते हुए नृत्य कर रही है।वो नजारा शायद उस वक़्त से 1000-2000 साल पहले का दृश्य था।मैंने देखा कि मंदिर के चारों ओर शिव भक्त आये हुए हैं और शिव-शिव शंकर,शिव-शिव शंकर,शंख जटाधर,गौरी शंकर,हर-हर शंकर,हर-हर शंकर,महाप्रभु गिरिपति गंगाधर रमणा हर हर शंकर हर हर हर….. गाते हुए झूम रहे थे। एक ओर हजारों की तादाद में लोग झूमते हुए गोल-गोल कूद-कूद कर मृदंग बजा रहे थे।वही दूसरी ओर लोग हज़ारों हजार की मात्रा में विराट डमरू,विशाल शंख और नाद बजाते हुए भक्ति में झूमे जा रहे थे। एक ओर हज़ारों महिलाये रात्रि में अपनी हथेली पर दिया रख कर ॐ शांति ॐ….ॐ नमः शिवाय का जाप कर रहीं थीं, तो दूसरी ओर हज़ारों साधू दोनो हाथों को जोड़ कर एक टांग पर खड़े समाधि की अवस्था मे लगातार ॐ का उच्चारण कर रहे थे,उन्ही के बगल में न जाने कितने अघोरी बड़ी हो भयावह मुद्रा ने अपनी जटाओं को खो कर अद्भुत नृत्य कर रहे थे और उनकी जटाओं में लगा राख धुएं की तरह निकल रहा था,उनमें कुछ अघोरी त्रिशूल के निचले भाग को धरती पर मार कर धम-धम की आवाज़ कर रहे थे। कोई नरमुंड में रखी राख को हवा में ऊपर उछाल रहा था तो कोई उसे अपने पूरे शरीर पर मल रहा था। सभी लोग शिव की भक्ति के वशीभूत थे। वहीं चाँद की सफेद रोशनी जो मंदिर के गर्भगृह में बने शिवलिंग में लगे बड़े से हीरे से हो कर गुजर रही थी,और वह रोशनी उस हीरे से कुछ इस तरह और भी तीखी और अत्यधिक चमक के साथ निकल रही थी की गर्भगृह के सामने से हो कर वह तीखी और तेज़ रोशनी आसमान में बादलों पर एक महा विशाल महादेव की आकृति बना रही थी मानो की कैलाश से खुद शिव आएं हों। मंदिर में लगे खोखलेे स्फ़टिक के ॐ में जब भी तेज हवा चलती तो ॐ की ध्वनि निकलती।बादलों के बनने और बिखरने से दैविक दृश्य दिख रहा था। जो महाविशाल शिव आकृति बादलों में पल-पल बन रही थी उसमे महाकाल का रूप देखते ही बनता था। त्रिशूल,गले में नाग,हाथ मे डमरू लिए वे समाधि में लीन थे। और उस दृश्य को देख भक्त गण और भी भक्ति की गहराइयों में अंदर और भी अंदर चलते ही जा रहे थे। पूरे वातावरण में मंत्रोच्चारण,डमरू,शंख और घण्टे की ध्वनियों के मिश्रण से ऐसे दिव्य लय में गूंज रहा था जिसे सिर्फ़ अनुभव ही किया जा सकता है।फिर जैसे वो दृश्य मेरे आंखों के सामने आया था ठीक वैसे ही चला भी गया और वो शिवलिंग का टुकड़ा जमीन पर गिर पड़ा। मुझे पूरी बात समझ आ गई थी। मैने हाथ जोड़ कर महादेव को प्रणाम किया और उस शिवलिंग के टुकड़े को उठा लिया। थोड़ी देर बाद में अपने दोस्तों के पास जा कर सो गया।मैं सोया ही था कि वो बैल मेरे पास आकर बैठ गया और जुगाली करने लगा।जुगाली करते हुए उसने अचानक मुझे एक नज़र देखा भी फिर न जाने कब मुझे नींद आ गई और मैं सो गया।सुबह हुई तो मैंने यह बात किसी को नहीं बताई।हम सब मिल कर सोमनाथ के नए मंदिर के दर्शन किये और दोपहर में बैलगाड़ी ओर बैठ कर घर की ओर चल पड़े। बैलगाड़ी का एक बैल चल तो आगे रहा था पर उसकी नजर लगातार मेरी ओर ही थी।मैं समझ चुका था कि वो नंदी महाराज हैं। दूसरे दिन अपने गांव आकर मैने वैसा ही किया जैसा नंदी महाराज ने कहा था। वहाँ पास में एक शिव मन्दिर था और उसने एक पंडित था जिसका नाम नंदिकेश्वर था।उनको मैंने वो शिवलिंग का टुकड़ा दे दिया और उसने मुझे रोज़ मंदिर आ कर उसका पूजन करने को कहा। अब यह बात तुम भी जानते हो। मेरी उम्र अब पूरी हो चुकी है।मैं झूठ नहीं बोलता हूँ तुम यह जानते हो और मेरे बाद उस शिवलिंग के पवित्र टुकड़े की रोज़ जलाभिषेक की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी”। बेटे ने कहा,” मुझे विश्वास नहीं होता है लेकिन आप कहते हैं तो मासन लेता हूँ।वैसे मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रही है।मैं निकलता हैं। महेश का पिता बाहर निकला ही था कि एक बैल बाहर खड़ा हो कर जुगाली करत हुआ महेश के पिता के बगल से गुजरा और अपनी आंखें मोड़ कर एक टक महेश के पिता को देखने लगा।महेश के पिता ने पहले ध्यान नहीं दिया लेकिन एक गूंजने वाली आवाज़ सुनाई दी,शिव शिव शंकर शंख जटाधर,गौरी शंकर,हर हर शंकर,हर हर शंकर…. ,और फिर वो ध्वनि शांत हो गई। महेश के पिता पसीने-पसीने हो गए। बैल घूम कर उनके सामने खड़ा हो गया और बैल के पीठ से एक 20 फुट ऊंची मानव आकृति वाली परछाई उठी और महेश के पिता के सामने खड़ी हो गई। विचारों के माध्यम से वो परछाई बोली मैं हूँ नंदी,तुम्हारे पिता सच बोल रहे हैं,अगर विश्वास नहीं होता है तो ….तभी महेश के पिता को अपने कंधे पर किसी के भारी-भरकम हाथ रखने का एहसास हुआ और एक आवाज़ आई,ये मेरा,नंदी का हाथ है अब तो विश्वास हो गया होगा। महेश के पिता भाग कर शिव मन्दिर गए और शिवलिंग पर सिर टीका कर रोने लगे।

–शिशिर पाठक

स्थिति डरावनी है..

यह धरती सिर्फ इंसानों की नहीं है। आधुनिक इंसान को धरती पर आए हुए सिर्फ 10 हजार साल ही हुए हैं।हमारे विकास से पहले यह पृथ्वी यहाँ पाए जाने वाले पशुओं की थी और वे एक दूसरे के फलने फूलने को मानवों की तरह सीमित करने की चेष्टा नहीं करते थे और न ही आज कर रहे हैं।उदाहरण के लिए जब एक पेड़ की टहनी बढ़ कर हमारे घर की दीवार के ऊपर से अंदर आ जाती है तो हम उसे यह बोल कर कटवा देते हैं कि अरे मेरा आंगन को गंदा कर देगी। लेकिन इंसान तो न जाने कब से दूसरे जीवों और प्राणियों के आंगन को हड़प रहा है। आज स्थिति ऐसी आ गयी है कि जंगलों के कटाव से हवा में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगी है।हवा में कार्बन डाइऑक्साइड इतनी बढ़ गयी है कि समंदर और नदियों का पानी एसिड में बदल जा रहा है। दुनिया मे पायी जाने वालीे 75-80 % ऑक्सीजन गैस समंदर में रहने वाले प्लवक बनाते हैं जो कि समंदर के पानी का एसिड में बदलने से धीरे- धीरे मर रहे हैं। इधर हर साल लाखों वर्ग मीटर वन भी काटे जा रहे हैं। कोई भी जीव बिना ऑक्सीजन के जीवित नहीं रह सकता। एक ऐसा वक़्त भी आएगा जो कि काफी निकट है और आज से सिर्फ 30 से 40 वर्ष दूर ही खड़ा है , जिस दिन न तो प्लवक होंगे और न ही वन बचेंगे साथ ही हवा में ऑक्सिजन भी नहीं बचेगी। उस दिन क्या होगा। सारी सृष्टि को मरने में 5 मिनट भी नहीं लगेंगे।इंसान का दिमाग ऑक्सीजन के बिना 2-5 मिनट में मृत हो जाता है। यह हमारे लिए डरने की …बहुत ज्यादा डरने की स्थिति है । मीडिया ये खबरें नहीं दिखायेगी और कानून के ठेकेदार इन चीजों पर कभी बहस नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें अपना भविष्य छोड़ कर सिर्फ नोट ही दिखता है। ये भी जान लें कि इस डर का इलाज सिर्फ इंसानों के पास ही है।

–शिशिर पाठक

ऋण…

गली में हर रोज़ की तरह काफी चहल-पहल थी।गली के मुहाने पर 4 मोटे-मोटे लोहे के खंभे लगे हुए थे जिसके चलते बाहर से कोई भी ऑटोरिक्शा अंदर नहीं आ सकता था और गली में सिर्फ साईकल, रिक्शा और दुकानदारों/ ख़रीददार की मोटरसाइकिल ही चलती थीं।गली में आज भी तिपहिया मोटर चालित वाहन नहीं चलते थे। शोर-गुल के नाम पर दुकानों में चलने वाले गाने,लोगों का आपस मे बोलना और खाने- पीने की दुकानों से बर्तनो के आपस मे टकराने की आवाज ही आती थी।आज भी गली में कुछ ऐसा ही माहौल था।रोज़ की तरह आज की भी दिनचर्या चल रही थी।“चोर…चोर….चोर,पकड़ो उसे,अरे वो भाग जाएगा…पकड़ो उस चोर को,कोइ पकड़ो चोर को”। एक लड़का खाली देह सिर्फ एक खद्दर की पैंट पहने बड़ी तेज़ी लोगों से बचते-बचाते भाग रहा था। भागते हुए वो गली के ऐसे मोड़ पर पहुंच गया जहाँ से उसका बच पाना असंभव था। लोगों ने उसे पकड़ लिया और पीटना शुरू कर दिया। इतने में एक आदमी हांफता हुआ आया,कुछ देर सांसे लेने के बाद उसने भी उस लड़के को दो-चार हाथ जड़ दिए।” दवाइयां इधर ला,दवा कितनी महंगी है तुझे पता भी है साले!इतना बड़ा हो गया है जा कर काम ढूंढ,चोरी करता है कमीने?” लड़के ने अपनी बाईं मुट्ठी ज़ोर से बंद कर रखी थी। सब लोग उसे पीट रहे थे,पर वो सिर झुकाए मार खाता जा रहा था। लोगों ने उसे उठा कर रोड पर लिटा दिया,एक आदमी ने उसके सिर को अपने पैर से ज़मीन पर दबा रखा था, तो दूसरे ने उसकी बाईं बांह को मरोड़ हुआ था। एक और आदमी उनकी बन्द मुट्ठी खोलने की कोशिश कर रहा था, और दवा की दुकान वाला उसे गालियाँ बक रहा था।कुछ पल बाद उसके आँसू फुट पड़े और वो ज़ोर से “नहीं-नहीं” बोलते हुए रोने लगा। उसकी मुट्ठी खुल ही चुकी थी कि इतने में आवाज़ आयी,“ये क्या कर रहे हो, बस करो,बहुत हो गया” एक आदमी सबको उस लड़के के ऊपर से हटा रहा था। उस भले मानुस ने लड़के को उठाया और उसकी मुट्ठी को धीरे से खोला जिसमे दवा की सिर्फ 3 गोलियां थीं। उसने लड़के के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,” माँ बीमार है”? लड़के ने सिसकते हुए हाँ की मुद्रा में सिर हिलाया। उस इंसान ने एक और सवाल पूछा,” तेरी माँ का नाम क्या है,और तेरे पिता कहाँ और कौन हैं,क्या वो कोई काम- धाम नहीं करते”? एक हाथ से अपने आँसू पोछते हुए लड़के ने कहा,” माँ का नाम मीना है और पिता का नाम भी मीना है”। आस- पास के लोगों ने बोला,” झूठ बकता है साला,ऐसे नहीं मानेगा,किसी के माता- पिता के एक ही नाम सुना है किसी ने,मारो साले को”। उस भले मानुस ने हाथ से इशारा कर सभी को रोका और लड़के से कहा,” सच बोल लड़के नहीं तो ये तुझे बहुत मार मारेंगे”। उत्तर देते हुए उस लड़के के दोनो आंखों से आँसू गिर रहे थे,अपने दोनों हाथ लटकाए उसने उस भले मानुस की आंखों में आंखे डाल कहा,“माँ ने मुझेे कचरे के डब्बे से उठा के पाला है,माता भी वो,पिता भी वो ही है”। उस इंसान ने बाकी के खड़े लोगों की ओर देखा,और बाकी के लोग पीछे हटते हुए एक दूसरे को देख रहे थे। वो भला मानुस उठा और दवा दुकान के मालिक को दवा के बदले 45 रुपये दिये और लड़के के एक हाथ को थामे अपनी कचौड़ी की दुकान पर लाया और ज़ोर से आवाज़ लगाई, ” बारह कचौड़ियाँ,चटनी और सब्जी पैक कर के जल्दी ला”। कुछ पल बाद दुकान वाले कि बेटी खाना पैक कर ले आयी। उस भले मानुस ने लड़के को पानी पिलाया और खाना दे कर विदा किया।दुकान वाले कि बेटी अपने पिता को गम्भीर मुद्रा में देख रही थी उसने पूछा,” और पैसे “? भले मानुस ने कहा,“हाँ उसकी माँ की दवा के पैसे दे दिये मैने”। उसकी बेटी आष्चर्यचकित मुद्रा में बोली,” क्या पैसे दे दिए,खाने के पैसे लेने के बजाए उसके दवा के पैसे भी दे दिए पिताजी आपने,इस महीने के बिजली का बिल का नोटिस आया हुआ है,और इस महीने ये पांचवीं बार आपने किसी को पैसे-रुपियों का दान दिया है,हमारा गुज़रा ऐसे कैसे चलेगा पिताजी!!” उसके पिता ने अपनो बेटी की नाक खींचते हुए कहा,” भगवान पर भरोसा रख,गुज़ारा तो क्या,ये पूरी ज़िंदगी चल जाएगी,जैसे उस लड़के की आज भगवान ने मेरे हाथों चलवाई”। तभी दुकान पर एक आदमी आया और कहा,”अरे भाई सुना है आपकी कचौड़ी बड़ी स्वदिष्ट है,एक काम करिये ये लीजिए 25 हज़ार रुपये,आज नेताजी के यहाँ पोता हुआ है,पूरे शहर के लोग आ रहे हैं। शाम 6 बजे तक 4000 प्लेट कचौड़ी भेज दीजियेगा बाकी का हिसाब कल कर लेंगे,धन्यवाद”। अपनी बेटी की ओर देखते हुए वह भला मानुस हँस पड़ा और साथ ही साथ उसकी बेटी भी मुस्कुरा उठी। इस वाकये को 20 साल गुजर गए थे। लेकिन आज भी गली वैसी की वैसी ही थी। हर रोज़ की तरह लोग अपने काम में लगे हुए थे।अब गली में थोड़ी भीड़ बढ़ गयी थी। वो भला मानुस बूढ़ा हो चला था और उसकी बेटी बड़ी हो गयी थी। लेकिन उसके दान देने की आदत अभी भी वैसी ही थी। सुबह का वक़्त था और दुकान पर एक भिखारी लंगड़ाता हुआ आया,उसे देख उस भले मानुस ने भिखारी को खाने को कुछ दे दिया,पीछे से उसकी बेटी ने मज़ाक में कहा,“आखिर कब तक ऐसे दान दीजिये पिताजी,बहुत पूण्य कमा लिया आपने”। अपनी बेटी को उत्तर देते हुए उसने कहा,” जब तक साँस चलेगी तब तक”। दोनों बाप- बेटी एक दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे। भले मानुस ने अपनी बेटी से कहा,“ज़रा अंदर से सने हुए आटे को जाकर ले आ”। उसकी बेटी बोली,” अभी लाती हूँ”। वह भला मानुस अपनी दुकान पर लोगों की भूख मिटाने की तैयारी करता हुआ भगवान की आरती गुनगुना रहा था, की तभी उसने सिर उठा कर सामने देखा,उसकी आंखें फ़टी रह गईं और वह ज़ोर से धम्म की आवाज़ के साथ फर्श पर गिर गया। बेटी ने बाहर आ कर देखा तो उसके पिता ज़मीन पर पड़े थे। वो बाबूजी बोल कर चिल्लाई जिसे सुन कर अगल-बगल के दुकानदार दौड़े चले आये। लोगों ने एम्बुलेन्स बुलाई और बाप-बेटी अस्पताल चले गए। वहाँ जांच में पता चला कि इस भले मानुस को ब्रेन हैमरेज हुआ है। नर्स ने आ कर इलाज,दवा और ऑपरेशन के खर्च बिल में लिख कर दे दिया जिसे देख लड़की के होश उड़ गए। बिल पर 45 लाख रुपये लिखा हुआ था। वो सिर पकड़ कर बैठ गयी और रोने लगी। वो सोच रही थी कि इतने सारे पैसे कहाँ से लाएगी। उसने आस-पड़ोस के दुकान वालो से गुहार लगाई जिन्होंने कुछ पैसों की मदद की भी लेकिन वो काफी न था। हार मान कर उसे दुकान को बेचने का सोचा। दुकान बिक गया लेकिन 40 लाख रुपये ही जमा हो पाए। लड़की ने सोच लिया की उसके पिता नहीं बचेंगे।अस्पताल जा कर वो अपने बेहोश पिता के पास बैठ यह सोच-सोच केर रो रही थी की इतने लोगों को आपने मुफ़्त में खाना खिलाया,न जाने कितनों का भला किया पर आज बेहोश लेटे हुए हो। आखिर ये सब का कोई मतलब है या नहीं,इन चीजों का क्या फायदा। कोई पूण्य -वूणय नहीं होता है,ये सब बकवास है। ये सब सोचते हुए वो अपने पिता के चरणों पर सिर रख कर रोते-रोते सो गई। रात होने वाली थी। नर्स ने उसे उठाया, वो समझ रही थी कि नर्स उसे अपने पिता को अस्पताल से ले जाने को बोलने आयी है,वो बहुत सहमी हुई थी। नर्स आयी और उसने कहा,” आप बाहर जाइये,इन्हें आपरेशन के लिए तैयार करना है”।लड़की अचम्भे में थी,वो सोच नही पा रही थी कि ये क्या हुआ,कहीं ये सपना तो नहीं,या फिर मज़ाक तो नहीं कर रहा कोई। उसने नर्स से कहा,“देखिए मज़ाक करने की कोई ज़रूरत नहीं है आपको,मैं अपने पिता को ले जा रही हूँ,इस से भी बड़े अस्प्ताल में इनका इलाज करवाऊंगी,अभी बिल पेमेंट नहीं कर सकती हूँ पर 3-4 दिन में सारा इंतज़ाम हो जाएगा”। नर्स ने कहा,” बिल तो हमारे एक डॉक्टर ने आपके नाम से भर दिया है,अब हटिये इन्हें आपरेशन थिएटर ले जाना है। वो बाहर जा कर बैठ गई और सोच में पड़ गई कि आखिर डॉक्टर ने पैसे क्यों भर दिए। नर्स स्ट्रेचर पर लड़की के पिता को ले कर जा रही थी,जिसके पीछे-पीछे लड़की भी चल पड़ी। चलते-चलते वो रो पड़ी और नर्स से कहा,“मुझे उस डॉक्टर से मिलना है”। नर्स ने कहा,“ये देखिए इन्होंने ही आपका पेमेंट किया है”। इतना बोल वो ऑपरेशन थियेटर में चली गई। डॉक्टर लड़की को देख मुस्कुरा रहा था,वह लड़की के मुखमण्डल पर प्रश्नचिन्ह को साफ-साफ देख सकता था।इस से पहले की लड़की कोई सवाल करती,डॉक्टर ने कहा,” 20 साल पहले मेरे लिए भी किसी ने 45 रुपये की दवा और कचौड़ी का दाम अपने सिर लिया था”। इतना बोल डॉक्टर ने अपना मास्क पहना और कमरे के अंदर चला गया। लड़की की आंखें खुली की खुली रह गईं।उसे अपने पिता की कहि बात की,”भगवान पर भरोसा रख ,गुज़ारा तो क्या पूरी ज़िंदगी भी चल जाएगी”, याद आ गई।वो हँसना चाहती थी पर हर बार रो जाती। वो बस खड़ी हो कर थोड़ी हस्ती हुई और थोड़ी-थोड़ी रोती हुई धीरे-धीरे ताली बजा रही थी।

—शिशिर पाठक

झोंका…

एक हवा का झोंका उठा, धूल को उड़ाते गोल घूमते हुए कहीं उड़ गया, अपने में ही झूमता हुआ वह झोंक बिना किसी की परवाह किये बस उड़ता रहा, उड़ते-उड़ते उसे किलकारी की आवाज़ आयी, जाकर देखा तो कोई जन्म ले कर रो रहा था, शायद भीड़ में शामिल होने आया था, नवजात की आवाज़ खुद में कैद किय वोे फिर उड़ चला,. मन्द-मन्द उड़ते उसे जलने की बू आयी, बू का पीछा किया तो जलती चिता पर एक इंसान लेटा ठहाका लगाता और बाकी सब रोते नज़र आये, वहाँ से लोगों के क्रंदन को लिये फिर उड़ पड़ा, उड़ ही रह था कि किसी ने शहनाई बजाई, नज़रें घुमा कर देखा तो बारात जा रही थी, पटाकों के जगह नोट जल रहे थे,पास ही एक बूढ़ा भिखारी कटोरा उठाये;सिर घुटनों में दबाये बैठा था यहाँ से उस झोंके ने शहनाई के सुर उठा लिए, सुरों को सुनता लम्बी छलांग लगा वो एक इमारत पर जा बैठा, वहाँ बैठ दो सांसे ली ही थी कि किसी के कराहने की आवाज़ आयी, नीचे झाँका तो दंगे हो रहे थे,छुप के देखा तो आगज़नी और मानवता मर चुकी थी, न चाह कर भी उसे लोगों की तड़प को उठाना पड़ा, अभी उठा ही था कि अचानक आँधी आई और झोंके को संग ले गई और ले गई वो आवाज़े, अनन्त आसमान में गूंज के साथ गुम होने को।

–शिशिर पाठक

2 दशक और…

रोती-बिलकती पृथ्वी आई

श्री हरि को अपनी व्यथा सुनाई

पालनहार होकर तुम मूक बैठे हो?

सुदर्शन चला संहार क्यों नहीं करते हो

दिया तुमने मानव को मति का वरदान

वे कुमति से अपने हैं ले रहे मेरे प्राण

हैं अब कर रहे मनुष्य अपनी मनमानी

देखो त्राहिमाम है कर रहा हर जीव-जंतु और प्राणी

कब तक शेषनाग पर तुम निद्रा पाओगे

कल्कि रूप धारण कर धरा पर कब आओगे

मानव ही मानव का काल बनेगा

कलयुग के कल-कारखानों से दम घुटेगा

नपुंसक होजाएगी एक दशक बाद कि पीढ़ी

युवक-युवती न चढ़ पाएंगे एक भी सीढ़ी

न हो सकेगा कोई अवतार और न होगा कोई संहार

चन्द दशकों में मानव की खुद ही लगेगी नैय्या पार।

—शिशिर पाठक

अनेको मेरे नाम…

जिस तरह इतिहास समय से दूर नहीं जा सकता वैसे ही मैं भी सभ्यताओं से दूर नही भाग सकता हूँ।विश्व स्तर पर भूगर्भिक गतिविधियों और इंसान की लालसा के चलते न जाने कब से मानचित्र बनते और बिगड़ते रहे हैं और कई बेनाम सम्राज्य और सम्राट इतिहास के पन्नो में गुम हो गए।लेकिन दुनिया के इस सफर में मेरा अस्तित्व हमेशा बरकरार रहा है।इतिहास कि करवटों के साथ मेरा नामकरन होता रहा पर,मेरे जितने नाम हैं उससे कहीं ज़्यादा हैं मेरी कहानियाँ।इतनी लंबी कहानी में सिर्फ और सिर्फ समय दर्शक बनकर मेरे साथ मूक अवस्था में चलता रहा। मेरी कहानियों को आप मेरे अनेक नामों का पर्यायवाची भी कह सकते हैं।शुरू से ही आर्यों से हूणों तक और गज़नी से अंग्रेज़ो के सार्वत्रिक साम्राज्य तक जो भी मेरे असीम और अथाह ख़ज़ाने को लूटने आया वो मेरी ही तहज़ीब में ढल गया,और उनकी पुश्तों ने मेरे ही कंधों पर आराम पाया।ब्रह्मांड और धरती की शृष्टि के बाद इतिहास ने असंख्य बार करवटें ली हैं लेकिन मानव सभ्य्ता के बिल्कुल शुरुआती दिनों में जब इंसान अपने अस्थायी जंगली तौर-तरकों को छोड़ एक स्थायी जीवन शैली को अपनाने की कोशिश कर रहा था उस वक़्त भारत मे द्रविड़ कबिले अपने चरम पर थे,और द्रविड़ों के समाज की बागडोर महिलाओं ने संभाल रखी थी।उनकी सैन्य कला,अर्थिक सूझ-बूझ और काबिलियत के बूते पूरे भारत में सब अपनी-अपनी सुकून भरी ज़िन्दगी जी रहे थे।पश्चिम के देशों में और मध्य एशिया में उन दिनों आर्य कबिलों की व्यवस्था में रहा करते थे और उनमें अक्सर आपसी झड़पें हुआ करती थीं उनमें से मीडिया नमक स्थान के आर्य झड़पो,लूट-मार के मारे पूर्व को ओर एक शांतिप्रिय जीवन की प्रप्ति के लिए आने लगे।आर्य के सूरमा अपने युद्धकौशल को बार-बार आपसी झड़पों की कसौटी पर घिंस-घिंस कर तेज कर चुके थे,और इसी युद्धकौशल ने उनकी पुर्व की ओर कूच को एक अभेद्य कवच प्रदान किया था।रथ और बड़ी कमान वाला धनुष आर्यों की विकसित तकनीक की देन थी। इन्हीं विकसित और उस समय के अनुसार अत्याधुनिक हथियारों के सहारे आर्यों ने अपना साम्राज्य उत्तर भारत मे स्थपित किया जिनमे से सबसे ताकतवर राज्य इक्ष्वाकु सूर्यवंशी राजाओं का अयोध्या में था और उनके महान सम्राट और श्री राम के भाई जिनका नाम भरत था उन्होंने ने अश्वमेध यज्ञ कर पूरे भूखण्ड सहीत द्रविड़ों को परास्त कर दक्षिण भारत की ओर धकेल दिया और सम्पूर्ण उपमहाद्वीप भारत कहलाया।धीरे-धीरे समय मज़बूत मुट्ठी में पकड़े रेत की भांति निकलता गया और साथ ही साथ वक़्त भारत की सत्ता पर आसीन राजा,महाराज और सम्राट के पदचिन्हों को उसी तरह साफ करते रहा जैसे समंदर किनारे लहरें किसी के पैरों के निशान को मिटा देती हैं। इस बीच वैदिक काल,हरप्पा संस्कृति,महाजनपद काल विकसित हुए और इतिहास ने इन्हें समय के पन्नों पर सुर्ख सुनहरी सियाही से अंकित कर दिया। 618 ई.पु में पारस के सम्राट दर्यबाहु ने भारत की पश्चिमी सीमा पर हमला किया और भारत में पारसियों का प्रथम आगमन हुआ। फिर पारस पर जब यवनों ने अधिकार जमाया तो उन्हें पारसियों से मेरीे(भारत) अतुलनीय सम्पत्ति और विक्सित विचारों का पता चला और 323ई.पु में अलक्षेन्द्र ने हमला किया लेकिन परास्त हुआ।इस समय मगध के चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को खड़ा किया और उसने महाभारत के लगभग 4800 साल बाद भारत को एकजुट किया,यहाँ से मौर्य वंश शुरू होता है।इस वंश में अनेक महान राजा आये जिनमे सबसे महान सम्राट अशोक हुआ,अभी जो भारत का मानचित्र है उसकी नींव सम्राट अशोक ने ही दी थी।उस वक़्त हजारों साल बाद भारत मे फिर से गंधार और सीलोन आए। यह वो समय था जहाँ एक ओर सम्राटों ने अपने राज्यों का विस्तार सैन्य ताकत के दम पर किया था तो दूसरी ओर बुद्ध और महावीर जैसे महान संतों ने शांति का संदेश दिया और 2 नए धर्म स्थापित कीये।धीरे-धीरे समय की मार से मौर्य वंश भी कमजोर हो गया और यवनों ने हमले पश्चिम में चालू कर दिये। यह वक़्त (200ई.पु- 150 इंसवी) यवनों के भारत आने का है जिनमे शक,कुषाण और पल्लव आपसी मतभेद और झगड़ों से भागकर मेरे(भारत) पास आये और भरतीय संस्कृति को और भी उन्नत बनाया। वे अपने साथ सोने के सिक्के बनाने की तकनीक,गंधार की मूर्तिकला,तेज़ घोडे,शेरवानी का पहनावा और युद्धकला लेते आये। इन सभों के मिश्रण से जो मज़बूत समाजिक ढांचा,कला,संगीत,वास्तु तैयार हुए उसकी बुलंदियों को ग्रीस,रोम और मिश्र के विद्वानों ने विश्व के आश्चर्यचकित करने वाली घटनाओं की संज्ञा दी थी।इस काल मे महाभारत का विस्तार,उपनिषद और पुराणों की रचना की गई। इस काल को स्वर्णिम काल की संज्ञा दी गई है।आने वाले 800-1000 सालों तक मिश्रित भरतीय समाज खूब फलता-फूलता रहा। इस बीच हूणों के द्वारा कई आक्रमण किये गए पर उन्हें भी यहाँ के कुशल राजाओं ने जैसे गुप्त वंश के यशोधर्मन ने परास्त कर दिया।गुप्त वंश लगातर हुनो के हमलों से कमज़ोर पड़ चुका था और इसके आखरी महान राजा यशोधर्मन थे। गुप्त वंश के बाद हर्षवर्द्धन ने उगता हुआ सूरज देखा जिसके दरबार मे चीनी यात्री हुआन चंग आया था।हर्षवर्धन के बाद सातवाहन,राष्ट्रकूट,पह्लव वंश ने मेरी ज़मीन पर अपनी छाप छोड़ी।एक बार फिर से समय ने करवट ली लेकिन यह करवट युगान्तरि साबित होने वाला था। 712 इंसवी में बिन कासिम ने कच्छ के राजा दाहिर पर हमला किया।यह इस्लामिक आताताइयों का भारत पर पहला आक्रमण था। फिर 1000-1025 इंसवी में महमूद गज़नी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा और 1190-92 इंसवी में महमूद घोरी ने 17 बार मेरी गर्दन पर तलवारें चलाईं। इतिहास में इस से पहले किसी ने भी मुझसे ऐसा बर्ताव नहीं किया था। आज से पहले और भी कई विदेशी आये थे लेकिन उन्होंने मुझे बंदी नहीं बनाया था और न ही लूट-पाट की थी। भारत के राजाओं की आपसी रंजिशों के कारण मैं पहली बार विदेशी ताकतों के हाथों बुरी तरह लहूलुहान हुआ।फलते-फूलते मेरे समाज को शुरुआती इस्लामी आतताइयों ने घोड़ों की टापों के नीचे रौंद डाला।दिल्ली में इस्लामी आतताइयों ने सल्तनत खड़ी की,मेरे रीति-रिवाजों को पदाक्रांत किया,रक्त की नदियाँ इस तरीके से बहीं की मेरी धमनियों में खून की कमी हो गई, लेकिन विधाता को कुछ और चाहता था। 1221 इंसवी में पूर्व से दिल्ली सल्तनत के लिये एक भयानक संकट चली आ रही थी।चंगेज़ खां की ताकत की आंधी के सामने जो आ रहा था वह एक ठूंठे वृक्ष की तरह स्वतः ही उखड़ जा रहा था। जिस तरह मंगोल भारत आये थे उसी तरह 1327 में चले भी गए लेकिन उनके कुछ अंश आज भी यहां के लोगों में मिलते हैं।मंगोलों की आंधी ने दिल्ली सल्तनत की नीवें हिला डाली और इस्लामी आतताइयों के साम्राज्य का सूरज शाम की लालिमा लिए आहिस्ता-आहिस्ता ढलने लगा। 1526 में मुझसे प्यार करने वाला एक बादशाह पानीपत की लड़ाई कर रहा था।उसका नाम था बाबर।मज़े को बात यह है कि बाबर को खुद नहीं मालूम था कि वह मुझसे प्यार कर बैठेगा,लेकिन उसने अपनी लेखनियों में दिल्ली की गलियों और भारत की ज़मीन को स्वर्ग का दर्जा दिया,और अपनी वसीहत में यह लिखा की भारत को अगर जीतना है तो यहाँ के लोगों,और उनके तौर-तरीकों को एक समान इज़्ज़त देनि होगी।बाबर के बाद हुमायूँ और फिर अकबर सत्तारूढ़ हुआ।यह मुगलों का दौर था। और अब मैं हिंदुस्तान के नाम से जाना जाने लगा।लगभग 1000-1200 साल बाद मेरे पास कोई ऐसा था जो मेरे ज़ख्मों पर पट्टियां कर सके और दवा लगाये। मुगल सही मायनों में मुझसे प्रेम करते थे। अपनी हुकूमत के विस्तार के लिए उन्होंने कई लड़ाइयाँ लड़ी जिससे यहाँ की युद्धकला में और भी निखार आया।मुगल- राजपूती कला और संस्कृति के संगम से एक बिल्कुल नई शिल्प कला और वास्तु कला का जन्म हुआ जिससे मेरी ज़मीन पर अलौकिक कृतियाँ की गईं। इस काल मे भक्ति दौर की शुरुआत हुई मीराबाई,तुलिदास,रहीम और रसखान जैसे भक्त कवियों न हिंदुस्तान के कोने-कोने में ऐसीे रचनाएँ की जिसे सुन मैं सैकड़ों सालों तक आंखें मूंद झूमता रहा।यह मेरा सबसे समृद्ध दौर था। मैं विश्व में सबसे अमीर और सैन्य शक्ति के अनुसार सबसे बलवान था।लेकिन आने वाला कल ऐसा घाव ले कर आया जिसे मैं न तो अपनी स्मृति से और न ही अपनी ज़मीन से मिटा सकता हूँ। पश्चिम के इंग्लैंड,फ्रांस,डच,पुर्तगाल आदि दरिद्र देश हिंदुस्तान की खोज कर रहे थे ताकि वे हिंदुस्तान से वयापार कर सकें लेकिन वयापार की आड़ में इंग्लैंड के अंग्रेज़ों ने बाकी के पश्चिमी देशों को मेरी ही सम्पत्ति का उपयोग कर परास्त किया और फिर मेरे से ही प्राप्त धन को प्रयोग कर मुझको बेड़ियों में डाल दिया। यह मेरी गुलामी का दौर था। ये मेरे लंबे इतिहास के कुछ ऐसे पल थे जिस समय मुझे भूख से मरना पड़ा,मेरी उपज को मेरी ही बर्बादी के लिए इस्तेमाल किया गया।200 साल तक मेरा दम तकनीकी धुएँ से घूँटता रहा,इस वक़्त मैं इंडिया कहलाया।फिर 1857 में मुझे आज़ादी की पहली खुशबू का एहसास हुआ,फिर उस खुशबू के फैलने से एक-एक कर मेरी बेड़िया खुद-ब-खुद टूटने लगीं। अंतिम में 1947 में मेरा पुनर्जन्म हुआ।लोकतंत्र की स्थापना हुई।सभी लोगो के उन्नति एक समान होने लगी।अब मैं अंग्रेज़ों की बनाई चीजों को खुद के लिए उयोग कर रहा था और उनसे आँखें मिलाये हुए बढ़ रहा हूँ।लेकिन आज भी मुझे वो पुराने राजा-रजवाड़ों की याद आती है,आज भी जब बादल गरजते हैं तो मेरे कानों में तानसेन का मेघ मल्हार गूंज उठता है। आज भी रानी/पटरानियों की हंसी मेरे कोने-कोने से आती हैं।आज भी ढोल-मारू, पृथ्वीराज चौहाण और संयोगिता की कहानी को याद कर मैं रोमांचित हो उठता हूँ और आज भी कभी-कभी जयभान जैसे विश्व के सबसे बड़ी तोप की गूंज से मेरी नींद खुल जाती है। आप मुझे अपनी इक्षानुसर जम्बूद्वीप,आर्यव्रत,भारत,हिंदुस्तान या फिर इंडिया,के नाम से बुला सकते हैं।

— शिशिर पाठक