Great soldier

O! Great Soldier you protect freedom that many others hate sheilding fellow citizens and guarding our fate

Wearing your pride serving with beauty, ready each second on the line of duty.

O!Great Soldier you face hard times without any comfort, you take all bullets like the LIONHEART.

O!Dear Soldier you are always ready to give; asking nothing in return, thank you for everything ,the flames of you bravery will forever burn.

–Shishira Pathak

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अंकल

सवेरे से बूढ़े अंकल बड़े खुश थे,आज का दिन कुछ खास था।वो मुझसे साइन लैंग्वेज में बात करते थे क्या करते वे मूक(गूंगे) थे।मैंने उनसे साइन लैंग्वेज में पूछा, “आज क्या बात है आप इतने हड़बड़ी में और खुश क्यों हैं? ठंड का समय था और वे हाथ में छड़ी ,रिस्ट वाच, भूरे रंग की गर्म टोपी,चटक लाल स्वेटर,उनकी पसंदीदा पैंट और पोलिश किये हुए जूते पहन कर न जाने किधर निकल गए।1-2 घण्टे बाद वापिस वे एक बड़ा झोला भर कर वापिस आये और मेरी फ्लैट की घण्टी बजायी,मैन दरवाज़ा खोल तो अंकल ने साइन लैंग्वेज में उनके साथ उनके घर आने को कहा।मैंने उनका झोला उठा लिया और उनके पीछे उनके घर चला गया।उनके घर पहुँचा तो उन्होंने थोड़ा रुकने को कहा और मुझसे झोला ले कर अपने कमरे में चले गए।कुछ देर बाद हाथ में 4 लाल गुलाब और एक लेडी की फोटो ले कर आये और टेबल पर रखा,फिर कमरे में गये और बड़ा सा स्ट्रॉबेरी केक ला कर फ़ोटो के सामने गुलाबों के साथ रख दिया। मैन पूछ यह फोटो किसकी है,अंकल ने कहा उनकी पत्नी की है और आज उनका जन्मदिन है,इसलिए वे आज इतने खुश हैं।अंकल ने अपनी लाल स्वेटर और टोपी को दिखा कर कहा कि यह उनकी पत्नी ने अपने हाथों से बुना है।मुझे लगा कि ऑन्टी जी अपने बच्चो के पास गयी होंगी फिर भी मैन पूछा कि आंटी कहाँ हैं तो उन्होंने मुस्कुरा कर बताये की ऑन्टी भगवान के पास जा चुकी है।मैं कुछ दुखी हो गया लेकिन वे नहीं हुए। मेरा हाथ पकड़ कर उन्होंने मुझसे केक कटवाया और पहला पीस फ़ोटो के सामने रखा दूसरा मुझे खिलाया,तीसारा पीस मैन उन्हें खिलाने की कोशीश की पर उन्होंने कहा ब्लड शुगर बढ़ जाएगी,तुम खाओ।इशारों में अंकल ने कहा कि वो किचन में कुछ पकाने जा रहे हैं,मैन कहा की आपकी मदद करता हूँ पर उन्होंने मना कर दिया और बैठने को कहा।उन्हें किचन गए चन्द मिनट ही हुए थे कि धम्म की आवाज़ आयी।मैं जा कर देखा तो अंकल फर्श बेहोश गिरे हुए थे। अगले ही पल मैंने अम्बुलेंस बुलाई और अंकल को अस्पताल में भर्ती किया। डॉक्टर ने कहा हालत नाजुक है,आप जा कर मिल लीजिये। मैं धीरे से हॉस्पिटल के कमरे में गया।हाथ उठा कर अंकल ने मुझे पास बुलाया और कुर्सी ओर बैठने को कहा। वे रोने लगे और साइन लैंग्वेज में मुझसे कहा,“आज से पहले मैंने अपनी पत्नी का जन्मदिन कभी नहीं मनाया,वो हमेशा कहती कि मैं बड़ा ही नीरस इंसान हूँ, न कभी शॉपिंग करता हूँ,और जो कभी वो करती तो उसका साथ नहीं देता हूँ।पर बेटा मैं क्या करता ज़िन्दगी जीने की भीड़ में पहले मेरी ज़िंदगी वैसे ही देर से शुरू हुई थी,जिस उम्र में लोग अरमानो को परवान चढ़ाते हैं मैं अपनों को बे-नकाब होते देख रहा था। पता नहीं की मैंने वो कौन सा जुर्म किया था जो तमन्नाओं की उम्र में तजुर्बे बुन रहा था।ज़िन्दगी किस्मत से ही चलती है बेटे दिमाग से चलती तो बीरबल ही सम्राट होता।यह ज़िन्दगी है कोई कपड़े का टुकड़ा नहीं जिसे रफू कर चला लिया। मुझे ख्वाबो वाला स्वेटर बुनने में कुछ वक्त लग गया और जब स्वेटर तैयार हुआ तो मौसम बदल चुका था।आखिर में यह कहना चाहूंगा कि मैं अक्सर बाजार से खाली हाथ ही लौट आया करता था क्योंकि पहले पैसे नहीं थे और जब हुए तो ख्वाहिशें ही नहीं रही ,बस बहुत कह डाला आज तुम घर जाओ में । मैने अंकल के बेटे बेटियों के बारे में पड़ताल की तो ओट लगा कि अंकल का इकलौता बेटा देश की सीमा पर 17 साल पहले वीरगति को प्राप्त हो चुका था। मैं हॉस्पिटल में ही रुका था अचानक अंकल के रूम में खलबली बढ़ गयी 5-10 मिनट बाद डॉक्टर ने खबर दी कि अंकल चल बसे। मैन मन ही मन सोचा कि उनके लिए अच्छा ही हुआ…

–शिशिर पाठक

नंगे पांव छाले तो पड़ते हैं

क्यों हो बैठे तुम पेड़ की छांव में,इन बिखरे हुए सूखे पत्तों के बीच?

क्यों हो घुटनों में अपने सिर गाड़े ,आंखे मीच?

नज़रें न चुराओ;अभी न घबराओ;

देखो इस छोटेे फूल को, कैसे घरती को चीर अपने हरे पत्ते फैलाये चिलचिलाती धूप को एक टक देख रहा,

इस घास को जिसकी नियति पदाक्रांत होने के सिवा कुछ नहीं ;फिर भी वे उठकर गर्म लू के थपेड़ों को झेल रहा।

देखो उस चिड़िया को जो बारिश में टूटे घोंसलों को फिर से उसी उमंग से बनाती है;सीखो मछलियों से जो नदियों में उल्टा तैर जाती है।

एक बाज़ बनो जो तूफानों के बीच नहीं उनसे कहीं ऊपर उड़ता है,बन जाओ वो हंस जो सिर्फ मोती चुगता है।

इन रहो पर तुमसे पहले भी पांव जले हैं और आगे भी जलेंगे क्योंकि नंगे पांव छाले तो पड़ते हैं।

-शिशिर पाठक

रहेंगे तो वानर ही

ये सन 2219 है।पिछले 13 साल से बारिश नहीं रुकी है,इतनी वर्षा से बचने के लिए सरकार ने रिहायशी इलाकों पर फोर्सेफीलड( ions निर्मित परत) बना रखी है।लोगों की औसत आयु आज 208 साल है जिसके चलते लोगों को इच्छा मृत्यु का अवसर प्रदान करने के लिए एक नया कारोबार विकसित हो गया है।लेकिन सरकारी नियमानुसार लोगों को कम से कम 140 साल जीवित रहना ही पड़ता है,इसके बाद वे इच्छा मृत्यु के अपने अधिकार का उपयोग करने के लिए,इच्छा मृत्यु प्रदान करने वाली कंपनियों के पास जा सकते हैं। मुद्रा को जगह पॉइंट सिस्टम ने ले ली है और लोगों को तनख्वाह पॉइंट्स के रूप में महीने के अंत में दी जाती है।लोग पैदा होने वाले बच्चों के रंग-रूप,प्रज्ञता,और जीवन भर बीमारी रहित जीवन,लम्बी उम्र को; DNA को अपने हिसाब से बदल कर, मानव शरीर के बाहर कृत्रिम कोख में बना सकते हैं।उत्थापन तकनीक के विकास से धरती पर कहीं भी आना-जाना बस 5-10 मिनटों का हो चुका है।दुनिया में देशों की सीमाएं खत्म हो गई हैं और पृथ्वीवासी एक ही सरकार के कानून को मानते हैं।मानव अब दूसरे ग्रहों(मंगल,शुक्र, बृहस्पति/शनि के उपग्रहों) पर अपनी घनी आबादी बसा चुका है और आज युद्ध एक और दूसरे ग्रहों के बीच ब्रह्मांड में हो रहे हैं।क्योंकि मानव कितनी भी तरक्की कर ले वो रहेगा तो एक वानर ही। –शिशिर पाठक

रचयिता या कौन??

रात के 2 बज रहे थे रवि गहरी नींद में था तभी कमरे के बीच मे एक लाल-पीला गोल प्रकट हुआ और 3 बड़े हट्टे-कट्टे गीले से जीव उस गोले से निकले,उसकी नींद खुल गयी लेकिन वो हिल नही पा रहा था,न ही कुछ बोल पा रहा था वो जम से गया था।उन जीवों में से एक ने हाथ ऊपर किया और रवि हवा में उठ गया। तीनो जीव उस गोले में घुस गुए और रवि भी उनके पीछे उड़ते हुए गोले के घुस गया।गोले के पार अजीब सी दुनिया थी। वहाँ बहुत से छोटे बड़े जीव कुछ जापानी,चीनी,कुछ केल्टिक जैसे तो कुछ बन्दर जैसे थे। वो उड़ते हुए एक टेबल नुमा चीज़ पर जा लेटा। वे 3 जीव उसे घेर कर खड़े हो गए और अजीब से उपकरणों से उस पर प्रयोग और कांट-छांट करने लगे,रवि चिल्लाने की कोशिश कर रहा था पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। वो पूरी ताकत लगा रहा था,तभी एक विचित्र से हरे रंग के सांप जैसे आंखों वाले जीव ने उसकी ओर देखा और न ही मन कहा,तुम सुरक्षित हो घबराओ मत,हम बस तुम्हारी जांच कर रहे है,पृथ्वी पर पूरे ब्रह्मांड के मानवों को हमने करोड़ों साल पहले छोड़ा था,इसलिए इंसान इतने अलग रंगों और बनावट के दिखते हैं,लेकिन रवि डर रहा था उसे दर्द हो रहा था,तभी वो ज़ोरों से चिल्ला उठा,उसकी नींद खुल गयी,वो अपने कमरे मे था,लेकिन उसे अब भी दर्द हो रहा था,उसने अपना पेट देखा तओ वहाँ एक चीरे का निशान था। -शिशिर पाठक

बादल

नील गगन में कहाँ जाते हो तुम,सफेद छरहरे रुई के टुकड़ों जैसे नीले पट पर किधर से आते हो तुम,पल-पल झोंको के हवा से रूप बदलता तुम्हारा,धीरे-धीरे रुक-रुक बढ़ता आकार तुम्हारा,एक के पीछे एक किसे ढूंढने आते हो तुम

धागों से बंधे अर्श पर,सूरज की सुनहरी किरणों पर;चुपचाप निरंतर आखिर किसका पीछा करते हो तुम,बिना किसी रूप बस हवा के अनुरूप ढल जाते हो खग देख तुम्हे बोल उठते;पेड़ों के पल्लव खिलने लगते,अंदर अपने नीर समेट क्या कर्तव्य निभाते हो तुम,

कभी गतिशील तो कभी धीमे,कौन जाने किधर बरसने को जाते हो,बताओ किसीकी बुलाहट पर आते हो तुम,

बादल क्यों कहलाते हो तुम?

–शिशिर पाठक

पिट्टो

आज एक अजीब सी बात हुई
ठंड का मौसम था
शाम हो रही थी,भीड़ में सभी कारों की और
मोटरसाइकिलों की बत्तियां जल रही थी
कुछ धुंद भी छा रही थी,धीमे धीमे से ठण्डी हवा भी बह रही थी
भीड़ के बिच रेल फाटक पर मैं
रेलगाडी आने का इंतज़ार कर रहा था
पास ही एक मैदान था
कुछ बच्चे वहाँ लाइट पोस्ट की नारंगी रौशनी के नीचे खेल रहे थे
एक बच्चे के हाथ में कुछ
गेंद सी दिखाई पड़ी, ध्यान से देखा तो घिसी-पिटी सी
धूल में सनी प्लास्टिक की “सफ़ेद” गेंद थी
गेंद वाला वो बच्चा भी देखा- देखा सा प्रतीत हो रहा था
वो छोटे बड़े पत्थरो को जमा कर एक के ऊपर एक रख रहा था
बाकी बच्चे उसके आस पास इकठ्ठा हो गए थे
उसने ज़ोर से गेंद को उन जमा किये पत्थरो पर दे मारा,और भागने लगा,
गेंद मैदान में दूर कहीँ चली गयी,अँधेरा हो चला था
बाकी के बच्चे गेंद को मैदान में इधर उधर ढूँढने लगे
वो बच्चा जल्दी -जल्दी फिर से पत्थरो को ठीक उसी तरह जमा करने लगा जैसे की उसने पहले किया था
अब तो खेल भी जाना हुआ लगने लगा था मुझे
तभी किसी बच्चे को गेंद मिल गयी, उसने गेंद ज़ोर से पत्थरो की ओर फेकी
जो छिटक कर अचानक मेरी ओर हवा में तेज़ि से बहती हुई आने लगी,आँखे ज़ोर से बंद कर मैंने
अपने चेहरे को बचने के लिए अपना “दाहिना” हाथ उठाया,लेकिन जब आँखेँ खोली मैंने
तब न तो बच्चे थे,न ही कोई पत्थर और न ही वह “सफ़ेद” गेंद…प्लास्टिक की..
बस रेलगाड़ी की ज़ोर से हॉर्न बजाते हुए फाटक को पार करने की अववाज़ थी
और उसके पहियो की आवाज़ पटरियों से निकल कर भीड़ में मिल सी जा रही थी

पिट्टो खेल रहे थे बच्चे……..पिट्टो..,
गुज़रे हुए कल में……..नाम तो सूना ही होगा आपने “पिट्टो” का
या फिर “शयाद” खेल भी होगा….क्यों ठीक “ही”कहा ना मैंने???…..

–शिशिर पाठक