The Unseen Tides

हम तौ हिय कै बिथा बखान रहे, पै तुम कछु बूझि न पायौ,

पलकन मा रुकी जो सावन रही, ओकर एको बूँद पहचान न पायौ।

ऊधो सो मन लै आए हौ तुम, मेरी नेह की पीर न जानत हौ,

हिय में जो लगी विरह की अगन, वाकौ तुम तनिक न मानत हौ।

जो शब्द कहे वे कोलाहल थे, जो मौन रहे वह एकांत हुआ,

यह बोधहीनता की प्राचीरें खिंचती गईं, और अंततः संबंध का अंत हुआ।

You read the script with perfect grace, but missed the soul inside,

A tragic art of being close, yet completely swept away by the tide.

ताना-बाना

रिश्तों का यह चिकना घड़ा, पकड़त फिसला जाए।
जितना तू इसे थामना चाहे, उतना हाथ जलाए ॥
ज्यों सूखे बाँस की रगड़ से, वन में आग भभकती।
त्यों ममता की कलह माहीं, तेरी काया सुलगती ॥

नारी-पुरुख, सुत-नाता देखौ, ज्यों बादल की छाया।
क्षण में उपजे, क्षण में बिनसे, झूठी तेरी माया ॥
पकरि पकरि सब ‘मेरा’ कहते, ज्यों बधिक ने जाल बिछाया।
पिंजर पड़ा पुराना पंछी, अब काहे पछताया ॥

कोई न तेरा, कोई न मेरा, सब रैन का सपना।
झूठे जग की झूठी प्रीति, किसको कहिये अपना ॥
गठरी बाँधी भरम-करम की, बोझ भया अति भारी।
नदिया बीच पड़ी है नैया, तू क्यों फिरे हंकारी ॥

जैसे जल में नाव चले है, लहरें कटती जावें।
तैसे ये सब संगी-साथी, क्षण में बिछड़ जावें ॥
तूने अपनी गर्दन डाली, ममता के इस फंदे।
आज़ाद परिंदा कैद हुआ है, देख मोह के धंधे ॥

ज्ञान की अग्नि भीतर दहका, जला यह मोह का बाना।
अकेला आया, अकेला जाएगा, यही सत्य पुराना ॥
परछाईं को पकड़ रहा तू, हाथ लगे न काई।
जाग सके तो जाग बावरे, अंत न कोई सहाई ॥

अग्नि को साक्षी मान के तूने, अग्नि ही घर लाई।
मीठी बातों की फाँस बिछी थी, तूने गर्दन फँसाई ॥
ज्यों बेल लिपटती वृक्ष से, रस सोखत है सारा।
त्यों गृहस्थी की चक्की माहीं, पीसा गया विचारा ॥

पग-पग नेह की ज़ंजीरें, पग-पग ममता की पहरे।
रिश्तों की उस भँवर के भीतर, गहरे हैं सब गहरे ॥
जो कल तक था आज़ाद पंछी, अब पिंजरे का दास।
आँखों देखी मक्खी निगली, मोह की ले के प्यास ॥

तिरिया  कहती स्वामी मेरे, सुत (पुत्र) कहता पितु मेरा।
बीच डगर में लुटा मुसाफिर, भूल गया सब डेरा ॥
जिसने दी थी कसमें साथ की, वही मरघट तक जाई।
फूँक के काया लौटे घर को, पल में हुई पराई ॥

भ्रम का सिंदूर, स्वार्थ का नाता, सब है रैन का मेला।
भीड़ खड़ी है द्वारे तेरे, फिर भी तू है अकेला ॥
जो इस तागे को तोड़ के निकले, वही अमर पद पावे।
वरना ये जग का ताना-बाना, बार-बार भरमावे ॥

तागा कच्चा प्रीत का, बाँधत सकल जहान।
जो छूटे तो दुःख घनेरा, जो पकड़े सो अज्ञान॥                 नाता-गोता जगत का, कच्ची ईंट की भीत।
भीतर बैठा काल है, बाहर गावत गीत ॥

हाड़-मांस का पुतला रचि के, तापर रंग चढ़ाया।
भीतर बैठा काल निरंजन, तूने ध्यान न लाया ॥
रिश्तों की यह कच्ची ताँती, तूने गला फँसाया।
अपने ही घर के पहरे में, तू जनम गँवा कर आया ॥

The supreme Decree


Whatever Rama has ordained, so shall it be,
An eternal truth, the Vedas’ decree.
O restless mind, why wander in vain?
Inscrutable is His will, beyond joy and pain.
Why bear the burden of a world so wide?
When the Master of All is your constant guide.
In His hands rest the threads of the vast design,
The boatman who leads to the shore divine.
No mortal can sway what His hand has traced,
The Sovereign of Purity, by whom we are graced.
Whatever Rama has ordained, so shall it be.
Stay steadfast in the field where duty lies,
Renounce the darkness where resentment thrives.
At the sacred union of the seeker and the deed,
He shall craft the destiny that fulfills every need.
The mists of doubt shall wither and depart,
When the lamp of faith is lit within the heart.
Whatever Rama has ordained, so shall it be.
The bedrock of justice, the pillar of right,
An ocean of mercy, radiating light.
The Lord of a billion realms untold,
Whose ears hear the prayers of the young and the old.
Benevolence is His ultimate aim and law,
Protecting the hope of the world we saw.
Whatever Rama has ordained, so shall it be.

श्री राम

कौसल्या की गोद विराजे, टुकुर-टुकुर लखि प्रभु मुसुकावहिं,
ममता मानहुँ देह धरि आई, वारि-वारि जननी बलि जावहिं।
अजहूँ ब्रह्म बँधे अँचरा महँ, लोरी सुनि-सुनि नयन मुँदावहिं,
कोटि बैकुंठ तजि रघुनायक, जननी-प्रेम-पीयूषहिं पावहीं।। विश्वामित्र संग सिधारे, मुनि-मख-रक्षक धनुष चढ़ावहिं,
ताड़का-मर्दन, अहिल्या-तारण, पद-रज पावन करि दिखावहिं।


जनक-पुर महिं भंजि पिनाका, सिय-संग व्याह रचायो भारी,
मिथिला-अवध भईं एक-रस, उमगी सुख-सरिता अविकारी।


तात-वचन मन धरि रघुराई, राज-पाट तजि कानन धाए,
कंटक-पथ कुसुमित भये सोई, जहाँ-जहाँ प्रभु चरण छुआए।


केवट-प्रेम, शबरी के जूठे, नीच-ऊँच सब भेद मिटावा,
विष्णु-अंश नर-लीला करि, भक्ति-पन्थ जग को सिखलावा।

जब तजि अवध चले रघुनायक, वन-पथ पाँय सिधारे,
मुरझाई प्रकृति, रोवत विहग, तरु-तरु नीर बहावे।
मूर्च्छित भईं रघुकुल-लक्ष्मी, विरह-ताप तन डोलै,
जड़-चेतन सब विकल भये जग, कोउ न कछु मुख बोलै।
खग-मृग तजि आहार-पियासा, पंथ निहारहिं रोई,
सरयू-धार भई थिर पावन, मगन विषाद महँ होई।
बन के कंकण-पत्थर रोये, परस जो पावन पावत,
छाया तजि घन धूप सहत प्रभु, दुःख सों सृष्टि लखावत।

वन-पंथ चले जब अवध-बिहारी, बिनु पद-त्रान सुकोमल पाँय।
तीखे कंकड़ चरन चुभत हैं, निरखि सकल जग अकुलाय॥
रोवत पाहन निज भाग विचारी, हा! हम प्रभु-पग शूल भये।
धिक्कार विधाता यह जड़ काया, जो राघव को क्लेश दये॥
​अंसुअन सों सब कंकड़ भीगे, चाहत होन धूरि के भेष।
जिन चरनन मुनि-वृन्द तरत हैं, तिन चरनन हम दीन्ह कलेष॥
हृदय विदीर्ण भयो पाहन को, जब-जब चुभे राम के पायँ।
चाहत कोमल रज बनि जावैं, प्रभु-पग-पंकज जहाँ धरायं॥
​रोम-रोम पाहन को काँपे, परस भये जब ब्रह्म-सुजान।
हम तो तरि गए परस पावन सों, पै घायल भये कृपानिधान॥
प्रकृति विलाप करै अस भारी, देखि राम-पद रक्त की धार।
मर्यादा हित मौन धरे प्रभु, सहत अवनि को सकल प्रहार॥


महालक्ष्मी तजि ऐश्वर्य-सुख, सिय-रूप धरि सँग धावहिं,
कंटक-पथ कुसुमित करिबे को, निज पद-कमल बिछावहिं।
राम-विरह अस पावक उपजी, सकल सृष्टि अकुलाई,
मर्यादा-हित ब्रह्म चले बन, ममता-मूरत मुरझाई।

कपट-भेष धरि नीच दसानन, सूनि कुटी जब सिय हरि लीन्हीं।
थर-थर काँपी धरनि क्रोध सों, पापी अधम अगति मति कीन्हीं॥
सूखि गए तरु-पात कोप तें, पवन रुद्ध भइ भान लुकाये।
सती-हरण लखि सकल चराचर, महा-प्रलय के चित्र बनाये॥
भयउ क्रुद्ध खग-राज जटायू, महाकाल सम गर्जन कीन्हा।
रे खल! कुटिल! अधम! रजनीचर! राम-प्रिया को तैं छलि लीन्हा॥
हरि वैदेही निज काल न्यौता, अब नहिं बचिहैं प्रान तिहारे।
रघुपति-बान-अनल महँ भस्महुँ, लंक-सहित सब वंस तुम्हारे॥

विप्र रूप तजि कपि निज रूपा, चरन पखारे नयन-जल धारा।
जनम-जनम की पीर मिट गई, मिल गए जीवन-प्रान-अधारा॥
गदगद कंठ बचन नहिं आवै, सिसकि-सिसकि पद-पंकज धरिहैं।
करुना-सिन्धु निहारि दास को, लोचन-जल सों अभिषेक करिहैं॥
​धरि निज कर सों सीस कपिन्ह को, राम हृदय सों तुरत लगायो।
अंसुअन पोंछि कृपा-सागर ने, लखन-समान अनुज करि पायो॥
रोवत प्रभु अरु रोवत मारुति, भीग गई सब कानन-झारी।
ब्रह्म लगावत उर वानर को, देखि चकित भई सृष्टि यह सारी॥
​दीन-हीन मैं अधम कपीसा, तुम त्रिभुवन के नाथ गोसाईं।
बार-बार प्रभु उर सों लावत, जननी सम अति नेह लुटाईं॥
भक्ति-विवश भये दीनबंधु अस, सेवक-स्वामि-भेद बिसरायो।
करुना-जल सों नहाई प्रकृति सब, अद्भुत प्रेम-प्रवाह बहायो॥


सिन्धु-बन्धु कपि-सैन संग लई, लंक-पति को मद-चूर कियो,
बिभीषण-अभय, सिय-उद्धार करि, धर्म-ध्वजा को ऊँच कियो।
पुनि अवध पधारे ‘राम’ अवतारी, घर-घर दीपन की उजियारी,
‘दास राघवेन्द्र-चरण-कमल में, वारूँ निज जीवन यह सारी।

तार-तार चदरिया


जतन बहुत कीन्हा रे भाई, बच-बच डगर बुहारी,
पग-पग कांटा, पग-पग कीचड़, कलयुग की दुनियादारी।
अमल सफेदी बचा रहा था, मन में थी वो साध,
पर इस कलयुगी दुनिया ने, बिछाए दुष्ट अपराध।
नोच-खसोट के ढांचे में से, चदरिया ली निकाल,
देखा तो कलयुग ने उसमें, कर दिए छेद कराल।
कदम-कदम पर नज़र गड़ी थी, विष की थी बौछार,
छिद्र-छिद्र से रिसने लगा है, अब रूह का सब सार।
चला बचाने पावन पट को, ढूँढ लिया इक घाट,
कलयुगी धोबी बैठा वहां, बिछाए मोह की खाट।
मैंने सौंपी झीनी चदरिया, धुल जाए सब दाग,
पर वो धोबी कलयुगी था, उगल रहा था आग।
काली शिला पे पटक-पटक कर, चदरिया कर दी तार,
कलयुग के उस काले जल ने, छीन लिया सब सार।
जो मैल मिटाने गया था बंदे, उसने अंग ही फाड़ दिया,
रूह की उजली उस चदरिया को, बीच भंवर में गाड़ दिया।
भीतर बैठा जो जुलाहा, उसकी तालीम को मान ले,
कौन तेरा और कौन पराया, ये मर्म ज़रा तू जान ले।
बाहर ढूँढा समाधान तो, पावन चोला छूटा,
सतगुरु के ही घाट पे अब, रह गया नाता अटूटा।

प्रारब्ध का विवर्त


विधि का विधान अमित है, इसकी गति अति गूढ़ अनूप,
क्षण में रंक बना दे नृप को, क्षण में नृप रंक स्वरूप।
काल-चक्र की नेमि पर, अंकित सबके भाग्य-लेख,
अचंभित रह जाता मन, जीवन के वैषम्य देख।
रघुकुल तिलक: राज्याभिषेक और निर्वासन
अयोध्या के प्रांगण में, अरुणोदय का भव्य प्रकाश,
सज्जित था सिंहासन स्वर्ण, होने को रामाभिषेक का भास।
मंगल-घोष, मुदित पुरजन, वंदनवारों की सजी कतार,
पर नियति ने रच रखा था, कुछ और ही प्रतिकार।
संध्या की म्लान बेला में, जब रवि ने मुख मोड़ा,
राजमुकुट की दीप्ति त्याग, राम ने राज-सुख छोड़ा।
वल्कल धार, जटाएँ बाँध, कंटक-पथ के पथिक बने,
प्रारब्ध के वज्र-प्रहार से, महलों के स्वप्न क्षण में ढहे।


कुरुराज दुर्योधन: अधर्म और अजेय सैन्य
परतुलना में खड़ा अधर्मी, दुर्योधन दुर्दान्त बड़ा,
ईर्ष्या के विष-कुंभ में डूबा, मदोन्मत्त वह अचल खड़ा।
पाप-परायण मानस उसका, कलुषित जिसकी हर कृति थी,
किन्तु भाग्य की छाया में, उसकी अखंडित ही द्युति थी।
अक्षौहिणी वाहिनी खड़ी, जिसके सम्मुख नतशिर हो,
भीष्म-द्रोण-कर्ण सदृश, जहाँ रथी और महावीर हों।
अन्यायी के कर में कौंधा, कुरु-साम्राज्य का दंड प्रबल,
यही विडंबना नियति की है—खल को भी मिलता है बल।


उपसंहार
“कर्म-प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करइ सो तस फलु चाखा।”
काल-खंड की देहरी पर, अंकित है यह शाश्वत सत्य,
भाग्य भले ही परीक्षा ले, पर धर्म ही होता नित्य।
राम ने वन में ‘रामत्व’ पाया, दुर्योधन ने सर्वनाश,
प्रारब्ध अंततः सत्य के ही, चरणों में पाता है वास।

अविनाशी का सृजन

न वहां काया, न वहां माया, न कोई रूप-स्वरूप,
बिन बाती बिन तेल वहां, प्रज्वलित अनहद धूप।

जहाँ न सूर्य पहुँचे भाई, न चंद्रमा की धार,
वहां एकांत में गढ़ रहा था, वो अलख सृजनहार।

बिन हाथों उसने मुझे बुना, बिन सूई के तार,
माता के गर्भ के शून्य में, भरा प्रेम अपार।

मिट्टी के इस कच्चे गृह में, जब प्राणों को सींचा था,
संसार के इस कोलाहल से, नाता तब न खींचा था।

अद्भुत शिल्पी वो धनी, कैसी बुनी ये देह-चूनर,
अंधेरी कोख में बैठकर, दिखा रहा था अपना हुनर।

न वहां ज्ञानी, न वहां शास्त्र, न कोई जाति-कुजाति,
एक ब्रह्म की ज्योति जली थी, जब जगी मेरी थाती।

अस्थि-चर्म का महल बनाया, पंच-तत्व का खेल,
श्वासों की डोरी से उसने, किया अमृत का मेल।

जहाँ शब्द न थे, राग न था, वहां उसकी अनुभूति थी,
मेरी आत्मा और उस परमेश्वर की, वो प्रथम आहुति थी।

वो गर्भ नहीं था साधारण, वो तो अविनाशी का द्वार था,
जहाँ रचने वाला और रचना, दोनों का एक ही आधार था।
अब कहाँ खोजूँ उस प्रीतम को, जो अंतर्मन में मौन है,

जिसने कोख में रक्षा की, भला उससे श्रेष्ठ अब कौन है?

I bleed awake, I bleed in dream

I bleed profusely, second by second,
From love that left me unprotected.
No knife, no scar, yet still I ache,
My heart keeps breaking for no mistake.

Each breath I take is borrowed pain,
Each thought a drop, each tear a stain.
Seconds fall like open veins,
Memories rust into my chains.

I scream in rooms that answer none,
My nights are long, my days undone.
I smile for faces, pay the cost,
While mourning someone never lost.

They named me guilty, wrote my sin,
Before I spoke, before I’d been.
Truth stood naked, unheard, alone,
While lies were crowned and made a throne.

Divorced in life, yet bound by law,
A husband called, but seen no more.
Your silence signed what courts did not,
A sentence slow, a rotting knot.

Your mother’s words still find my skin,
Sharp as shame, soaked deep within.
I bleed again, though nothing’s new—
Old wounds reopen just from you.

Not all blood spills where eyes can see,
Some floods the soul silently.
I walk upright, yet die inside,
A man alive, yet crucified.

If mercy lives, let truth descend,
Either bring you back—or end the end.
For this half-life, this broken plea,
Is bleeding more than death would be.


माधुर्य-प्रत्यय

मिठास न जिह्वाग्राह्य रसिकता का क्षणिक प्रकाश,

यह माधुर्य है चेतना का दीर्घकालिक आत्मसंयमित विन्यास।

मधुरिमा, रसालता, स्निग्धसौष्ठव, कोमलप्रसादिकता,

न शब्दकोषीय पर्याय ये मानस की परिसंस्कृत अंतःसंवेदनात्मक प्रगल्भता।

 

शर्कराभ द्रव्यों में निहित नहीं अमृतत्व का विधान,

वह उद्भूत होता है संवेदन-विवेक-संस्कार के गहन संधान।

जहाँ विचार-प्रवाह रहे अनुद्वेग-निरपेक्ष-समाहित,

वहीं स्फुरित होता है सुमाधुर्य निःशब्द, अव्याहत, अपरिमित।

 

मनुष्य मिठास को स्वादग्राही कोशों से नहीं परखता,

वह उसे स्मृति-अनुभव-कालबोध की त्रयी से ग्रहण करता।

जिह्वा तो केवल रासायनिक उद्दीपन की यांत्रिक युक्ति,

वास्तविक रस है मानसिक संस्कार की अंतर्निहित स्फुटि।

 

कभी यह क्षमाशील सौम्यता बन कर आक्रोश का क्षय करे,

कभी संयमित मृदुलता में कटु सत्य को भी ग्राह्य करे।

कभी करुणापूरित मौन में अर्थों का गहन विस्तार,

कभी नैतिक सुरभि बन कर आचरण में रच दे संस्कार।

 

विज्ञान इसे स्वीट-रिसेप्टरों का कहे संवेग-संयोग,

पर मानव जाने यह भावात्मक अनुशासन का दीर्घ प्रयोग।

जहाँ अनुरक्ति न ढले आसक्ति-आवेश के गर्त में,

वहीं मधुरता टिकती है संयमित चेतना के अर्थ में।

 

मिठास न हर्षोल्लास, न भावोन्मत्त कोमलता,

यह परिपक्व चेतना की धीमी, दृढ़, अविचल गति-शीलता।

जो अहं को न पोषित करे, जो सत्य को न ढके,

वही सुमाधुर्य है ,शेष सब इंद्रियजन्य व्यवहार के।

मैडम का किटी-कहर

पति दफ्तर में बना कोल्हू का बैल,

मैडम का जारी किटी वाला खेल।

ताश की बाजी में डूबी लुगाई,

बेचारे हस्बैंड की शामत आई।

बच्चा स्कूल से बना ‘बजरंगी भाईजान’,

मैडम को बस सहेलियों का ध्यान।

​मेकअप की परत जैसे पुताई की दीवार,

क्लब में नाचने को हर दम तैयार।

ठुमकों से टूटा फर्श का कोना,

पति को मिला बस कोने में रोना।

डांस फ्लोर पर ऐसी मची खलबली,

मैडम जैसे ‘मुन्नी’ होकर चली।

​जेब खाली, फिर भी हीरे का हार,

पार्लर में स्वाहा हुआ सारा घर-बार।

बच्चा मांगे दूध, मिला ‘एनर्जी ड्रिंक’,

मैडम की आंखें बस डिस्को में ब्लिंक।

हस्बैंड का कॉलर हुआ पूरा ढीला,

मैडम का ड्रामा सबसे रंगीला।

​ताश के पत्तों में ढूंढा संसार,

घर का लगा दिया पूरा कबाड़।

गपशप का टैलेंट एकदम सुपरफास्ट,

पूरी गृहस्थी का कर दिया ब्लास्ट।

‘सेल्फी’ की भूखी, ममता से दूर,

पार्टी के नशे में एकदम चूर।