कौसल्या की गोद विराजे, टुकुर-टुकुर लखि प्रभु मुसुकावहिं,
ममता मानहुँ देह धरि आई, वारि-वारि जननी बलि जावहिं।
अजहूँ ब्रह्म बँधे अँचरा महँ, लोरी सुनि-सुनि नयन मुँदावहिं,
कोटि बैकुंठ तजि रघुनायक, जननी-प्रेम-पीयूषहिं पावहीं।। विश्वामित्र संग सिधारे, मुनि-मख-रक्षक धनुष चढ़ावहिं,
ताड़का-मर्दन, अहिल्या-तारण, पद-रज पावन करि दिखावहिं।
जनक-पुर महिं भंजि पिनाका, सिय-संग व्याह रचायो भारी,
मिथिला-अवध भईं एक-रस, उमगी सुख-सरिता अविकारी।
तात-वचन मन धरि रघुराई, राज-पाट तजि कानन धाए,
कंटक-पथ कुसुमित भये सोई, जहाँ-जहाँ प्रभु चरण छुआए।
केवट-प्रेम, शबरी के जूठे, नीच-ऊँच सब भेद मिटावा,
विष्णु-अंश नर-लीला करि, भक्ति-पन्थ जग को सिखलावा।
जब तजि अवध चले रघुनायक, वन-पथ पाँय सिधारे,
मुरझाई प्रकृति, रोवत विहग, तरु-तरु नीर बहावे।
मूर्च्छित भईं रघुकुल-लक्ष्मी, विरह-ताप तन डोलै,
जड़-चेतन सब विकल भये जग, कोउ न कछु मुख बोलै।
खग-मृग तजि आहार-पियासा, पंथ निहारहिं रोई,
सरयू-धार भई थिर पावन, मगन विषाद महँ होई।
बन के कंकण-पत्थर रोये, परस जो पावन पावत,
छाया तजि घन धूप सहत प्रभु, दुःख सों सृष्टि लखावत।
वन-पंथ चले जब अवध-बिहारी, बिनु पद-त्रान सुकोमल पाँय।
तीखे कंकड़ चरन चुभत हैं, निरखि सकल जग अकुलाय॥
रोवत पाहन निज भाग विचारी, हा! हम प्रभु-पग शूल भये।
धिक्कार विधाता यह जड़ काया, जो राघव को क्लेश दये॥
अंसुअन सों सब कंकड़ भीगे, चाहत होन धूरि के भेष।
जिन चरनन मुनि-वृन्द तरत हैं, तिन चरनन हम दीन्ह कलेष॥
हृदय विदीर्ण भयो पाहन को, जब-जब चुभे राम के पायँ।
चाहत कोमल रज बनि जावैं, प्रभु-पग-पंकज जहाँ धरायं॥
रोम-रोम पाहन को काँपे, परस भये जब ब्रह्म-सुजान।
हम तो तरि गए परस पावन सों, पै घायल भये कृपानिधान॥
प्रकृति विलाप करै अस भारी, देखि राम-पद रक्त की धार।
मर्यादा हित मौन धरे प्रभु, सहत अवनि को सकल प्रहार॥
महालक्ष्मी तजि ऐश्वर्य-सुख, सिय-रूप धरि सँग धावहिं,
कंटक-पथ कुसुमित करिबे को, निज पद-कमल बिछावहिं।
राम-विरह अस पावक उपजी, सकल सृष्टि अकुलाई,
मर्यादा-हित ब्रह्म चले बन, ममता-मूरत मुरझाई।
कपट-भेष धरि नीच दसानन, सूनि कुटी जब सिय हरि लीन्हीं।
थर-थर काँपी धरनि क्रोध सों, पापी अधम अगति मति कीन्हीं॥
सूखि गए तरु-पात कोप तें, पवन रुद्ध भइ भान लुकाये।
सती-हरण लखि सकल चराचर, महा-प्रलय के चित्र बनाये॥
भयउ क्रुद्ध खग-राज जटायू, महाकाल सम गर्जन कीन्हा।
रे खल! कुटिल! अधम! रजनीचर! राम-प्रिया को तैं छलि लीन्हा॥
हरि वैदेही निज काल न्यौता, अब नहिं बचिहैं प्रान तिहारे।
रघुपति-बान-अनल महँ भस्महुँ, लंक-सहित सब वंस तुम्हारे॥
विप्र रूप तजि कपि निज रूपा, चरन पखारे नयन-जल धारा।
जनम-जनम की पीर मिट गई, मिल गए जीवन-प्रान-अधारा॥
गदगद कंठ बचन नहिं आवै, सिसकि-सिसकि पद-पंकज धरिहैं।
करुना-सिन्धु निहारि दास को, लोचन-जल सों अभिषेक करिहैं॥
धरि निज कर सों सीस कपिन्ह को, राम हृदय सों तुरत लगायो।
अंसुअन पोंछि कृपा-सागर ने, लखन-समान अनुज करि पायो॥
रोवत प्रभु अरु रोवत मारुति, भीग गई सब कानन-झारी।
ब्रह्म लगावत उर वानर को, देखि चकित भई सृष्टि यह सारी॥
दीन-हीन मैं अधम कपीसा, तुम त्रिभुवन के नाथ गोसाईं।
बार-बार प्रभु उर सों लावत, जननी सम अति नेह लुटाईं॥
भक्ति-विवश भये दीनबंधु अस, सेवक-स्वामि-भेद बिसरायो।
करुना-जल सों नहाई प्रकृति सब, अद्भुत प्रेम-प्रवाह बहायो॥
सिन्धु-बन्धु कपि-सैन संग लई, लंक-पति को मद-चूर कियो,
बिभीषण-अभय, सिय-उद्धार करि, धर्म-ध्वजा को ऊँच कियो।
पुनि अवध पधारे ‘राम’ अवतारी, घर-घर दीपन की उजियारी,
‘दास राघवेन्द्र-चरण-कमल में, वारूँ निज जीवन यह सारी।